वह किसान नहीं है….?: (हनीफ मदार)

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हनीफ मदार 94 2018-11-17

किसान और किसानी पर बातें तो खूब होती रहीं हैं उसी तादाद में होती रही हैं किसानों की आत्महत्याएं | बावजूद इसके कोई ठोस नीति किसानों के हक़ में अब तक नहीं बन पाई | हालांकि ऐसा भी नहीं कि भारतीय राजनैतिक पार्टियों के एजंडे में किसान शामिल न हो बल्कि किसान प्राथमिकता में दर्ज है | भारतीय विकास की अवधारणा हो या फिर कारपोरेट विस्तार की, बात बिना किसान के अधूरी है | फिर क्यों किसान आज तक महज़ बात-चीत, भाषण और कथित किसान आन्दोलन के लिए विषय भर बना हुआ है ? इधर मौसम की मार ने किसान को इस कदर हलकान किया है कि अब उस पर न केवल राजनैतिक पार्टिया ही चर्चा और वहस कर रही हैं बल्कि आम आदमी भी किसान की ही बात कर रहा है | तब फिर से वही सवाल मुंह बाए आ खडा होता कि क्यों किसान को सिवाय आत्महत्या के कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझ रहा |

वह किसान नहीं है….? 

हनीफ मदार

किसान और किसानी पर बातें तो खूब होती रहीं हैं उसी तादाद में होती रही हैं किसानों की आत्महत्याएं | बावजूद इसके कोई ठोस नीति किसानों के हक़ में अब तक नहीं बन पाई | हालांकि ऐसा भी नहीं कि भारतीय राजनैतिक पार्टियों के एजंडे में किसान शामिल न हो बल्कि किसान प्राथमिकता में दर्ज है | भारतीय विकास की अवधारणा हो या फिर कारपोरेट विस्तार की, बात बिना किसान के अधूरी है | फिर क्यों किसान आज तक महज़ बात-चीत, भाषण और कथित किसान आन्दोलन के लिए विषय भर बना हुआ है ? इधर मौसम की मार ने किसान को इस कदर हलकान किया है कि अब उस पर न केवल राजनैतिक पार्टिया ही चर्चा और वहस कर रही हैं बल्कि आम आदमी भी किसान की ही बात कर रहा है | तब फिर से वही सवाल मुंह बाए आ खडा होता कि क्यों किसान को सिवाय आत्महत्या के कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझ रहा |

जहाँ पहले देश में किसानों की आत्महत्या की ख़बरें महाराष्ट्र के विदर्भ और आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र से ही आती थीं, वहीं अब इसमें नए इलाक़े जुड़ गए हैं. इनमें बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाक़े ही नहीं, बल्कि देश की हरित क्रांति की कामयाबी में अहम भूमिका निभाने वाले हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य शामिल हैं. इसके अलावा औद्योगिक और कृषि विकास के आंकड़ों में रिकॉर्ड बनाने वाले गुजरात के क्षेत्र भी शामिल हैं. अब जब वर्तमान आधुनिक तकनीक के समय में भूकंप, सुनामी, बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं से जूझने और निपटने को जहां आयोग, विभाग, नीति रणनीति हैं तब क्यों महज़ किसान के लिए किसी प्राकृतिक आपदा से उबारने के लिए कोई मुकम्मल नीति नहीं बनाई जा सकी …?
यदि किसान आत्महत्याओं के सरकारी आंकड़ों की बात करें तो ‘नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो’ के अनुसार 1995 से मार्च २०१३ के मध्य 2,96 438 किसानों ने आत्महत्या की है | लेकिन यदि भारतीय किसान की श्रेणी में कोंन से किसान शामिल किये जाते हैं इस तथ्य को भी सामने रखकर देखें तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है | यह चौंका देंने वाली बात है कि सरकारों के पास किसान को परिभाषित करने का मापदंड जनसंख्या के लिए परिभाषित किसान की परिभाषा से एक दम अलग है। इस के अनुसार यहाँ उस व्यक्ति को ही किसान की श्रेणी में रखा जा
सकता है जिसके पास खुद की ज़मीन है | जबकि उन असंख्य किसानों को किसान होने का दर्जा प्राप्त नहीं हो पाता जो हर साल पट्टे या बटाई पर अन्य बड़े किसानों से खेत लेकर खेती करते हैं | यहां तक कि इसमें उन लोगों को भी शामिल नहीं किया गया है जो अपने घर के खेतों को सम्हालते हैं लेकिन जिनके नाम में जमीन नहीं है। मसलन अगर किसी घर में पिताजी के नाम में सारी जमीन है लेकिन खेती की देखभाल उसका लड़का करता है तो पिताजी को तो किसान का दर्जा मिलेगा लेकिन बेटे तब तक किसी भी किसान आपदा का लाभ प्राप्त नहीं हो सकता जब तक कि ज़मीन के शिज़रे में उसका नाम शामिल नहीं हो जाता | यही वज़ह है कि ऐसे कितने ही किसानों की हत्याएं सरकारी आंकड़ों में शामिल नहीं हो पातीं |

इन प्राकृतिक आपदाओं में हमेशा ही बड़े पैमाने पर वही किसान प्रभावित होते हैं जिन्हें हमारी सरकारें किसान ही नहीं मानतीं | जानकारों की मानें तो देश में आज लगभग पचास फीसद से कहीं ज्यादा वही लोग खेती किसानी में जुटे हैं जो कि भूमिहीन या सीमान्त किसान हैं जो खेती के अलावा कुछ और कर ही नहीं सकते हैं | यह किसान उन लोगों से खेत बटाई या पट्टे पर लेते हैं जो बड़ी ज़मीनों के मालिक हैं और खुद खेती न करके शहरों में निज कारोबारी या नौकरीशुदा हैं | किसान अपनी ज़मापूंजी एक साल के पट्टे के लिए खेतदार को दे देता है और उस में लगने
वाली लागात के लिए वह मजबूर होता है आढ़तियों या साहूकारों द्वारा वसूली जाने वाली ब्याज की ऊंची दरों पर क़र्ज़ लेने को | पूरे साल खेत में मेहनत करने के बाद आई ऐसी आपदाओं में फसल के चौपट होने पर किसी सरकारी रहत या मुआवज़े के लिए वह तो गुहार लगाने का अधिकारी भी नहीं रहता, क्योंकि सरकार की दृष्टि में तो वह किसान है ही नहीं | जबकि उसी चौपट फसल का मुआवजा या क्षतिपूर्ति उन लोगों को ही मिलजाती है जो एक साल के लिए अपने खेत की कीमत पहले ही वसूल चुके होते हैं | ऐसी स्थिति में क़र्ज़ के बोझ से दबे किसान को कोई रास्ता नज़र नहीं आता और ……|

किसी भी आपदा के समय क्षतिपूर्ति के आंकलन के लिए लेखपालों को अधिकृत कर उन्ही की रिपोर्ट पर निर्भर हो जाने के चलते सीमान्त या छोटे किसानों की स्थिति भी इससे बहुत ज्यादा भिन्न नहीं है | ऐसा भी नहीं कि इस बात से हमारी सरकारें अनभिज्ञ हैं कि लेखपाल राजस्व विभाग का कर्मचारी होता है न कि कृषि विगाग का इसलिए जरूरी नहीं कि उसे फसलों की बहुत ज्यादा जानकारी हो | हालांकि फसलों के क्षतिपूर्ति के लिए प्रभावित फसल के आंकलन की जिम्मेदारी कृषि विभाग के अधिकारियों की होती है लेकिन आम तौर पर व्यावहारिक रूप में ऐसा न पाने के कारण भी छोटा किसान सरकारी राहत से महरूम रह जाता है |
इन तमाम आत्महत्याओं की वज़ह इस साल के खराब मौसम की मार को मान लेना शायद उचित नहीं होगा बल्कि इसके कारण इस बात में भी तलाशने की जरूरत है कि खेती करना अब घाटे का सौदा हो गया है. पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहां किसानों की लागत में बहुत तेज़ी से वृद्धि हुई है इसके अलावा चीनी मिलों पर हज़ारों करोड़ रुपए का बकाया, भूमिहीन किसानों को बैंक से क़र्ज़ न मिलने के कारण मंडियों में बैठे साहूकारों द्वारा वसूली जाने वाली ब्याज की ऊंची दरों पर क़र्ज़ लेने को मजबूर होना, आपदा के बाद किसानों को राहत के लिए क्षति पूर्ती के आंकलन में दशकों पुरानी व्यवस्था और मानदंडों का जारी रहना वहीँ कृषि उत्पादों की गिरती क़ीमत किसानों में निराशा की सबसे बड़ी वजह बन रही है |

ऐसे में आवश्यकता है किसान को तकनीकी रूप में प्रशिक्षित करने और खेती के प्रति व्यावसायिक तरीके से उसकी भागीदारी सुनिश्चित किये जाने की | जिससे किसी आपदा के समय अपने प्रति हुए अन्याय के लिए महज़ शिकायत करने या उसे अपनी किस्मत की मार समझकर आत्महत्या को विवश होने की बजाय अपने नुकसान और उसकी भरपाई के लिए सीधा दावा प्रस्तुत कर सके | आवश्यकता उन कानूनों और नीतियों में बदलाव की भी है जहाँ किसान होने का प्रमाण ज़मीन का मालिक होना भर न होकर खेती किसानी से हो फिर वह चाहे एक साल के लिए पट्टे या बटाई पर ली गई ज़मीन में खेती करने वाला किसान ही क्यों न हो | भले ही एक साल के लिए ही सही उसे किसान होने के सारे अधिकार प्राप्त होने ही चाहिए |

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
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जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी", "रसीद नम्बर ग्यारह"

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

email- hanifmadar@gmail.com

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बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

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