बाज़ार और साम्प्रदायिकता… कविता (अनवर सुहैल)

सार्थक, समर्थ और सामाजिक भाव-बोध पैदा करती 'अनवर सुहैल' की दो कवितायें .....|  बाज़ार और साम्प्रदायिकता...  बाज़ार रहें आबाद अनवर सुहैल बढ़ता रहे निवेश इसलिए वे नहीं हो सकते दुश्मन भले से वे रहे हों आत... Read More...

‘पहचान’ पर एक ख़त: (अनवर सुहैल)

'अनवर सुहैल' के उपन्यास "पहचान" पर 'पाखी' ने किन्ही धर्मव्रत चौधरी की समीक्षा छापी थी..जिसमे उपन्यास की विषयवस्तु और लेखक के औचित्य पर सवाल उठाया गया था...उस समीक्षालेख के संदर्भ में "अनवर सुहैल"  की  प्रतिक्रि... Read More...