नाक के नीचे : आलेख (रूपाली सिन्हा )

समय बीतने के साथ मेरी नाक के नीचे इतनी चीज़ें इकट्ठी हो गयी थीं कि अब देखने में मुश्किल होने लगी थी। आहिस्ता आहिस्ता मानो नज़र धुंधली पड़ने लगी थी और ज़बान? जब नज़र ही साफ़ न हो तो बोलने का क्या अर्थ रहता है? वैसे भी... Read More...

आवाज़ों के घेरे : आलेख (डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’)

सामाजिक और राजनैतिक, वैचारिक समानता और द्वन्द के बीच साहित्य से लालित्य और भारतीय संस्कृति के लोक रंग कहीं विरक्त हो रहे हैं | निसंकोच साहित्य की सार्थकता वैचारिक प्रवाह एवं राजनैतिक चेतन के बिना न केवल अधूरी ब... Read More...

हवा हवाई है हमारा यह अंध राष्ट्रवाद : आलेख (पलाश विस्वास)

"हमें मुल्क की परवाह हो न हो, इस मुल्क के लोगों की परवाह हो न हो, हमें सरहद और देश के नक्शे की बहुत परवाह है। हमें इस देश की जनता की रोजमर्रे की बुनियादी जरुरतों की, उनकी तकलीफों की, उनके रिसते हुए जख्मों की, उ... Read More...

राजा रवि वर्मा: दो फ़िल्में, दो नजरिए : फिल्म समीक्षा (प्रो० विजय शर्मा)

"जब कलाकार और उसकी कृतियों की कहानी किसी दूसरे कैनवस पर उकेरी जाती है तो वहाँ बहुत कुछ बदल जाती है। सच्चाई और कल्पना का मिश्रण एक नई कृति रचता है। यही हुआ है हाल में बनी दो फ़िल्मों में। ‘मकर मञ्ञ्’ और ‘रंग रसिय... Read More...

थम गया संगीत का एक और स्वर: “रवींद्र जैन” , डा0 मोहसिन खान ‘तनहा’

कालाकार कभी अपनी चमक खोते नहीं हैं, बल्कि इनकी चमक कभी न डूबने वाले, कभी न टूटने वाले सितारों के समान है, जो दिन में, रात में अपनी आभा लिए झिलमिला रहे हैं। 'रवींद्र जैन' एक ऐसी पक्के साधक वाली शख्सियत का नाम है... Read More...

पश्चिमी नारीवाद की अवधारणा और विभिन्न नारीवादी आंदोलन :आलेख (डा0 नमिता सिंह)

"स्त्रियों की अंधेरी दुनियां में रोशनी के प्रवेश की, घर-परिवार की चारदीवारी के भीतर सामाजिक-धार्मिक बंधनों में जकड़ी स्त्री मुक्ति की कहानी लगभग अठारहवीं शताब्दी से ही शुरू हुई। विश्व के अलग-अलग देशों में यह बद... Read More...

सिनेमाई स्त्री का विकास और इतिहास : आलेख (डॉ.यशस्विनी पाण्डेय)

परिवार और राष्ट्र की धुरी 'स्त्री' द्वारा दुनिया में लड़ी गई 'स्त्री मुक्ति और अस्मिता' की लड़ाई का इतिहास सदियों पुराना है | इन आंदोलनों के विभिन्न रूप और संदर्भों को दुनिया भर के कला, साहित्य ने न केवल खुद में ... Read More...

हिन्दी के प्रयोग में सोशल मीडिया की भूमिका : आलेख (ब्रजेश कानूनगो )

ऐसे में सोशल मीडिया अपने तमाम खतरों और अतिवादी प्रकृति के बावजूद भाषा विशेषकर हिन्दी और हिन्दी साहित्य के प्रसार में बहुत मददगार हो सकता है. हुआ भी है. थोड़े विवेक और समझदारी से किये इसके उपयोग से नए जमाने के नए... Read More...

कभी फ्रांस का प्यारा था ISIS: आलेख (सुरेश ऋषि)

पेरिस हमले को दुनिया के किसी तर्क से सही साबित नहीं किया जा सकता है लेकिन ईराक-सीरिया में भूमिका को लेकर खुद फ्रांस सरकार भी कठघरे में है।  अपने नागरिकों की जान-जोखिम में डालने वाली फ्रांस सरकार की विदेश नीति औ... Read More...

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान : आलेख ‘नवीं क़िस्त’ ( नमिता सिंह)

राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न कार्यक्रमों के नेतृत्व में हिन्दू स्त्रियों के अलावा मुस्लिम, पारसी और मार्गरेट कूजीन्स व ऐनी बेसेंट जैसी विदेशी महिलाएँ भी थीं।  राष्ट्रीय आंदोलन ने यह भी प्रमाणित किया कि महिलाओं क... Read More...