जिस्म ही नहीं हूँ मैं : कविता (संध्या नवोदिता)

कविता के रूप में आकार लेती आधुनिक स्त्री जो लवरेज है अपने समय के ज़िंदा सवालों से, जो ढहा चुकी है सामाजिक रुढियों के मानवीय अंतर के किले को,.... खड़ी होती अपने पैरों पर इंसानी रूप में बुनने को एक आकाश सामाजिक भाग... Read More...

आवाज दे कहां है…!: कहानी (गीताश्री)

वह अपने डर को काबू में रखने की कोशिश करती पर किशोर मन में जो डर की नींव पड़ी थी, उस पर इतनी बड़ी इमारत बन चुकी थी कि वह चाह कर भी उसे गिरा नहीं सकती थी. उसे गिराने के लिए साहस की सुनामी चाहिए थी, जो हो नहीं सकती ... Read More...

मौत के बाद भी आवाज़ ज़िंदा है, ‘गौरी लंकेश’: आलेख (आरिफा एविस)

इस तरह की हत्याओं का ये पहला मामला नहीं हैं. पहले भी आवाज उठाने वालों को मौत के घाट उतार दिया. दाभोलकर ,पनसारे ,कलबर्गी और गौरी लंकेश में एक ही चीज कॉमन थी वो यह कि उनकी आवाज जनता की आवाज बनी थी. शोषित, उत्पीड़ि... Read More...