बिहार वाली बस : लघुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

"ले, अब मर. कितनी बार कह चुका हूं. बस में सारे बच्चे लेकर मत चलाकर. साला किधर –किधर इस भीड़ में उसे खोजूं. पांच दफा तो आवाज लगा चुका... पर कमीना जो ठहरा – एक चूं की आवाज उससे देते नहीं बन रहा." एक चुप्पी के बाद... Read More...