मरने के अलग-अलग स्टैंडर्ड : व्यंग्य (सुजाता तेवतिया)

जीवन भर पेटभर रोटी नहीं ..... बाद मरने के ख्वाब सुहाने |  बाज़ार के सपनीले सब्जबाग की गांठे खोलने का प्रयास करता 'सुजाता तेवतिया' का व्यंग्य ...... कबीर की इस लाइन के साथ “हम न मरै मरिहै संसारा हमको मिला जियावन ... Read More...

बच्चों को कम न आंके : नाट्य रिपोर्ट (शिवम् राय)

बच्चों को कम न आंके शिवम् राय भारतेन्दु नाट्य अकादमी ‘रंगमण्डल’ लखनऊ के द्वारा हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी एक माह की ‘बाल रंगमंच कार्यशाला’ की गयी। जिसके अन्तर्गत पंजाबी नाटककार डा० सत्यानन्द सेवक के नाटक ‘क... Read More...

कबीर गायन की विविध शैलियाँ और उसकी संप्रेषणीयता: आलेख (रोहित कुमार)

कबीर को ज़्यादातर मालवा में ही गाया जाता है। कुमार गंधर्व एकमात्र ऐसे संगीतज्ञ हुए हैं जिन्होंने मालवांचल की बोली मालवी और उसके लोकगीतों को बंदिशों का स्वरूप दिया. उत्तरप्रदेश की अवधि का असर तो कई उत्तर भारतीय स... Read More...

अतुल्य भारत की अतुल्य तस्वीर : व्यंग्य (विवेक दत्त मथुरिया)

जब कोई शख्य किसी भी अतुल्यता के अतुल्य सच को कहने की जुर्रत करता है तो अतुल्य सहिष्णुता अतुल्य असहिष्णुता में तब्दील हो जाती है। अगर आज कबीर दास कुछ कहते तो वह भी इसी अतुल्य असहिष्णुता का शिकार हो गए होते। अच्छ... Read More...

भक्ति आन्दोलन और काव्य: समीक्षा (आशीष जायसवाल)

‘सूर की कविता  का समाज’ और ‘मीरा के काव्य में सामाजिक पहलू’ दो ऐसे महत्वपूर्ण कवियों के विषय में लिखा गया लेख है जो प्रायः हिन्दी साहित्य के आलोचकों के उतने प्रिय विषय नहीं रहें है एवम् इनकी काव्यों में सामाजिक... Read More...

ईमानदारी का पर्व और वो: व्यंग्य (आरिफा एविस)

बीवी ने समझाया कि तुम काम पर जाओ मैं जाकर लाइन में लग जाऊँगी बच्ची छोटी है तो क्या हुआ? घर में मरीज है तो क्या हुआ ? किसी न किसी को तो बैंक जाना होगा अगर घर का खर्च चलाना है. ईमानदारी का पर्व है पूरा देश मना रह... Read More...

समकालीन हिन्दी आलोचना और कबीर: आलेख (संजय कुमार पटेल)

कबीर पर आज तक जितने भी आलोचक अपनी आलोचना से दृष्टिपात किए हैं वह आज भी सबको स्वीकार्य नहीं है । सभी लोग अपने-अपने अनुसार कबीर को व्याख्यायित करने का प्रयास किए हैं लेकिन उन्हीं में से कबीर के प्रति कुछ ऐसे भी श... Read More...

ख़तरे में इस्लाम नहीं: एवं अन्य, ‘हबीब ज़ालिब’ की ग़ज़लें

सदियों के रूप में गुजरते समय और देशों के रूप में धरती के हर हिस्से याने दुनिया भर में लेखकों कलाकारों ने सच बयानी की कीमत न केवल शारीरिक, मानसिक संत्रास झेलकर बल्कि अपनी जान देकर भी चुकाई है .... इनकी गवाहियों ... Read More...