ज़ुल्म के गलियारों में : एवं अन्य कविताएँ (सीमा आरिफ)

वर्तमान के सामाजिक, राजनैतिक तंग हालातों के बीच भविष्य के मानवीय खतरों को देखने का प्रयास करती 'सीमा आरिफ़' की लेखकीय सामाजिक सरोकारी प्रतिबद्धता उनकी रचनाओं की तरह बेहद गहरी होती जान पड़ती है | इन गहराती आशंकाओं... Read More...

इंसानियत, एवं अन्य कविताएँ (प्रेमा झा)

कुछ व्याकुल सवालों के साथ इंसानों की बस्ती में इंसानियत और प्रेम को खोजतीं 'प्रेमा झा की कवितायें ..... इंसानियत प्रेमा झा तुमने मुझे प्यार किया मजहब की दीवारें तोड़कर मुल्क की दीवारें लांघकर मगर ... Read More...

दुनिया का सबसे गरीब आदमी: कविताएँ (चंद्रकांत देवताले)

देवताले जी की कविताओं में नैतिकता व मनुष्यता का उजास दिखाई देता है साथ ही एक विरूद्ध होते संसार में रहने का सच भी ऊजागर होता है। ऐसे ही उम्मीद के कवि की कविताएं जनशक्ति का आह्वान तो करती ही हैं।  दुनिया का स... Read More...

उम्मीद ही तोड़ती है आदमी को हर बार: कविताएँ (नित्यानंद गायेन)

समय के बीच मानव मन की व्याकुल रिक्तता को विवेचित करतीं 'नित्यानंद गायेन' की समय सापेक्ष रचनाएँ .....|  उम्मीद ही तोड़ती है आदमी को हर बार  नित्यानंद गायेन मिटा दिया जाऊंगा एक दिन तुम्हारी डायरी के उस पन... Read More...

अदृश्य दुभाषिया: एवं अन्य कविताएँ (अभिज्ञात)

अचेतन मानव तंतुओं को चेतन में लाने का प्रयास करतीं 'अभिज्ञात' की कवितायें ...... अदृश्य दुभाषिया  अभिज्ञात चिट्ठियां आती हैं आती रहती हैं कागजी बमों की तरह हताहत करने समूची संभावना के साथ कौन सा शब्... Read More...

हमारे समय के धड़कते जीवन की कविताएं: समीक्षा (डॉ० राकेश कुमार)

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के मध्यांतर में प्रदीप मिश्र की कविताएं तेजी से बदलते भारतीय समाज के विविध रंगों को हमारे सामने लाते हैं। वर्तमान समय में भारतीय समाज लोकतंत्र, भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद और निजीकरण की बड़ी ... Read More...

मंडी हाउस में एक शाम: एवं अन्य कविताएँ (अंकिता पंवार)

कविता प्रेम है, प्रकृति है, सौन्दर्य है और सबसे ऊपर एक माध्यम है खुद के प्रतीक बिम्बों में समाज के धूसर यथार्थ को उकेरने का | जैसे खुद से बतियाते हुए मानस को सुनाना या मानस से बतियाते हुए खुद को सुनाना | कुछ ऐस... Read More...

जीवन में बसती हैं कविताएँ: समीक्षा (सुरेश उपाध्याय)

ब्रजेश कानूनगो की कविताओं पर बात करने के लिए कवि के अपने परिवेश और क्रमिक विकास को समझना एक बेहतर उपाय हो सकता है। कविताओं में उनकी सरल भाषा, सहज सम्प्रेषणीयता, अपने आस-पास के सन्दर्भों से उठाई विषय वस्तु और प्... Read More...

‘विमल कुमार’ की तीन कविताएँ

(दंगे इंसानियत के माथे पर कलंक की तरह होते हैं और जिनोसाइड जैसी अमानवीय कृत्य से इंसानियत शर्मसार होती है. दंगो में मारे गए लोग चाहे किसी धर्म/जाति/नस्ल/लिंग  के हों बेबात मारे जाते हैं और न्याय-तंत्र सबूतों के... Read More...

आज की लड़की, एवं अन्य कविताएँ: (सुलोचना खुराना)

इंसानी ज़ज्बात जब खुद व खुद शब्द ग्रहण कर मानवीय अभिव्यक्ति बनकर फूटते हैं, निसंकोच ऐसी रचनाएं मन के बेहद करीब से गुजरती हैं | कुछ ऐसा ही सुखद एहसास देती हैं 'सुलोचना खुराना' की यह कवितायें .... | - संपादक  आज ... Read More...