सुखिया की डोली एवं अन्य कवितायें, अमरपाल सिंह ‘आयुष्कर

वर्तमान समय में लगातार बढ़ती तकनीकी और बाजारवाद के प्रभाव के कारण मानवीय रिश्तों के बीच आई दरार को बयाँ करती अमरपाल सिंह 'आयुष्कर की कवियायें -  अनीता चौधरी  सुखिया की डोली अमरपाल सिंह 'आयुष्कर ' सुखिया कं... Read More...

कलबुर्गी तुम्हारे लिए : कविता (पुलकित फिलिप)

युवा कवि 'पुलकित फिलिप' की कविताओं के रचना संसार का ज्यादा भाग आक्रोश से भरा है | यह रचनाएं गवाह हैं इस बात की कि वर्तमान युवा केवल निराशा से ही नहीं बल्कि आक्रोश से भी भर रहा है | बतौर बानगी पूँजी और पूँजीवाद ... Read More...

एक संक्षिप्त परिचय और कवितायें : स्मरण-शेष, वीरेन डंगवाल

इस त्रासद समय में भी 'उजले दिन जरूर आएंगे' का भरोसा दिलाने वाले साथी जन कवि 'वीरेन डंगवाल' हमारे बीच नहीं रहे | आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली ....| इस जन साहित्यिक त्रासद पूर्ण घटना से दुखी सम्पूर्ण हमरंग परिव... Read More...

अधेड़ औरतें एवं अन्य कवितायें, प्रमोद बेड़िया

शब्दों से स्पंदित होती संवेदना के जीवंत और सवाल पूर्ण छत्र उकेरती हुईं 'प्रमोद बेड़िया' की दो कवितायें ..... संपादक  अधेड़ औरतें प्रमोद बेड़िया अधेड़ होती लड़की के दुख कोई नहीं जानता ,देखिए न मैं भी दुख क... Read More...

स्त्री जब पुरुष के साथ…! एवं अन्य कविताएँ (सीमा आरिफ)

मशीनी सभ्यता से मानवीय रिश्तों की गर्माहट से तपती ज़मीन को खोज लाना लेखकीय जिद है जैसे जीवित किन्तु इंसानी अवशेषों का प्रमाण | कुछ ऐसी ही ज़िद है "सीमा आरिफ़" की  रचनाओं में जो भावुक स्पर्श और भ्रामक स्पंदन के बीच... Read More...

मुझे तुम पर पूरा यकीन हैं एवं अन्य कवितायें, नित्यानन्द गायेन

सच फासीवाद की सूली पर है | मौक़ा परस्ती न केवल चरम छू रही है बल्कि यथार्थ  चित्रण  को प्रभावित करती अवसर वादिता .... ऐसे में सच और भ्रम के खांचे में फिट होता इंसानी कोहराम .... इस पीड़ादायक विभीषिका में भी सच के ... Read More...

आयेंगे अमरीका से अच्छे दिन एवं अन्य कवितायें, विमल कुमार

प्रतीकों के गहरे संदर्भों के साथ गहन गंभीरता के साथ आती आधुनिक कविता में 'विमल कुमार की कवितायें एक अतरिक्त खिंचाव के साथ आती हैं | सहज सरल शब्दों में मौजूं वक्ती परिस्थितियों को व्यंग्यात्मक रचनाशीलता के साथ उ... Read More...

स्थिति नियंत्रण में है एवं अन्य कवितायें, शहनाज़ इमरानी

अनचाहे गहराते अंधेरों में व्याप्त सन्नाटे को अपने रचना शब्दों से तोड़ने का प्रयास करती "शहनाज़ इमरानी की कविता .....| - संपादक  स्थिति नियंत्रण में है शहनाज़ इमरानी पुलिस कि गश्त है चौराहों, सड़कों, गलियों म... Read More...

एक जोड़ा झपकती हुई आँखें : कविता (पद्मनाभ गौतम)

हमरंग का संपादकीय आलेख 'विचलन भी है जरुरी ' को पढ़ते हुए 'पद्मनाभ गौतम' को यह अपना भोगा हुआ यथार्थ लगा | और सहज ही उनकी कलम से यह कविता आलेख पर टिपण्णी के रूप में निकली | यह कविता एक पद्मनाभ का ही यथार्थ नहीं लग... Read More...

जिस्म ही नहीं हूँ मैं : कविता (संध्या नवोदिता)

कविता के रूप में आकार लेती आधुनिक स्त्री जो लवरेज है अपने समय के ज़िंदा सवालों से, जो ढहा चुकी है सामाजिक रुढियों के मानवीय अंतर के किले को,.... खड़ी होती अपने पैरों पर इंसानी रूप में बुनने को एक आकाश सामाजिक भाग... Read More...