लिखो ‘बसंत’ : कविता (के पी अनमोल)

अपने दौर की चिंता चुनौतियां हमेशा ही साहित्य सर्जकों के चित्त में शामिल रहे हैं | अपने समय से मुठभेड़ करती 'के पी अनमोल' की कविता .....| - संपादक   लिखो 'बसंत' के पी अनमोल धर्म को ज़रूरत नहीं होती गधों क... Read More...

तारकोल की सड़क पर : कविता (अनुपम त्रिपाठी)

युवा छात्र, संस्कृत कर्मियों की बनती यह सामाजिक दृष्टि अपने दौर की एक सुखद छाँव की अनिभूति से भर देती है, कुछ यही एहसास कराती हिन्दू कॉलेज में बी.ए.(आनर्स) सैकंड इयर के छात्र 'अनुपम त्रिपाठी' की यह कविता .....|... Read More...

अँधेरे की पाज़ेब: एवं अन्य कविताएँ (निदा नबाज़)

अतीत के गहरे जख्मों से रिसते दर्द पर भविष्य के सुखद मानवीय क्षणों का मरहम रखती, 'निदा नवाज़' की कविताएँ......|  अँधेरे की पाज़ेब निदा नबाज़ अँधेरे की पाज़ेब पहन आती है काली गहरी रात दादी माँ की कहानिय... Read More...

बाज़ार और साम्प्रदायिकता… कविता (अनवर सुहैल)

सार्थक, समर्थ और सामाजिक भाव-बोध पैदा करती 'अनवर सुहैल' की दो कवितायें .....|  बाज़ार और साम्प्रदायिकता...  बाज़ार रहें आबाद अनवर सुहैल बढ़ता रहे निवेश इसलिए वे नहीं हो सकते दुश्मन भले से वे रहे हों आत... Read More...

जन-गण-मन एवं अन्य कवितायें, स्मरण शेष (रमाशंकर यादव ‘विद्रोही)

3 जनवरी 1957 को फिरोज़पुर (सुल्तानपुर) उत्तरप्रदेश में जन्मे, रमाशंकर यादव 'विद्रोही' हमारे बीच नहीं रहे ... जैसे जे एन यू खाली हो गया है... जैसे फक्कड़ बादशाहों की दिल्ली खाली हो गयी है !! उनका बेपरवाह अंदाज़, फ... Read More...

डर… : कविता (अनिरुद्ध रंगकर्मी)

हमरंग हमेशा प्रतिवद्ध है उभरते नवांकुर रचनाकारों को मंच प्रदान करने के लिए | यहाँ हर उस रचनाकार का हमेशा स्वागत है जिसकी रचनाएँ आम जन मानस के सरोकारों के साथ रचनात्मकता ग्रहण करने को अग्रसर दिखाई देती हैं | हमर... Read More...

अंधी गली का मुहाना : कविता (अशोक तिवारी)

भारतीय समाज के संघर्ष शील अतीत को सामने रखकर हमारे आज से सवाल करती 'अशोक तिवारी' की कविता ....... अंधी गली का मुहाना अशोक कुमार तिवारी ये कौन सी गली में आ गए हम कौन सी वादियों में घिर गए कि कुछ सुझाई नह... Read More...

यह नया साल: एवं अन्य कवितायेँ (अनुपम सिंह)

जहाँ एक तरफ नए साल के स्वागत के में पार्टियों और शोर-शराबों का आवेग है वहीँ वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक बदलाव के बीच किसी कलैंडर की तरह बदलते और गुजरते वर्षों को युवा पीढ़ी खुद के भीतर बढती हताशा के रूप में देखन... Read More...

हमारे समय में कविता: रिपोर्ट (अन्तरिक्ष शर्मा)

हर वर्ष की भांति एक जनवरी २०१६ को कोवैलैंट ग्रुप ने अपना स्थापना दिवस अनूठे तथा रचनात्मक ढंग से उन युवा और किशोर प्रतिभाओं के साथ  मनाया |जिनकी सामाजिक, साहित्यिक और कलात्मक प्रतिभाएं किसी मंच के अभाव में मुखर ... Read More...

डर.. : कविता (अनिरुद्ध रंगकर्मी)

हमरंग हमेशा प्रतिवद्ध है उभरते नवांकुर रचनाकारों को मंच प्रदान करने के लिए | यहाँ हर उस रचनाकार का हमेशा स्वागत है जिसकी रचनाएँ आम जन मानस के सरोकारों के साथ रचनात्मकता ग्रहण करने को अग्रसर दिखाई देती हैं | हमर... Read More...