डर.. : कविता (अनिरुद्ध रंगकर्मी)

हमरंग हमेशा प्रतिवद्ध है उभरते नवांकुर रचनाकारों को मंच प्रदान करने के लिए | यहाँ हर उस रचनाकार का हमेशा स्वागत है जिसकी रचनाएँ आम जन मानस के सरोकारों के साथ रचनात्मकता ग्रहण करने को अग्रसर दिखाई देती हैं | हमर... Read More...

कुछ तो शर्म करो एवं अन्य कविता (अनीता चौधरी)

पूंजीवादी राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं, अवसर और बाज़ार के प्रभाव में नई गढ़ी जातीं और बिकतीं प्रेम व्याख्याओं की  अनुसंधानिक प्रयोगशाला में निश्छल मानवीय प्रेम को तलाशती 'अनीता चौधरी' की दो कविताएँ ......| - संपादक  ... Read More...

परसाई का मुँह काला कर दिया जाता……: आलेख (हफीज़ किदवई)

परसाई की कलम बिलकुल घिसीपिटी नही थी। उसमे एक चमक थी। धार थी। जो किसी भी बुराई को काटने की ताक़त रखती। कविता, कहानी, उपन्यास, लेख सबमे परसाई ने खूब काम किया। अपने आखरी दिनों तक वह सिर्फ और सिर्फ लिखते रहे। वह भी ... Read More...

‘मृगतृष्णा’ की कवितायें……

मृगतृष्णा की कविताएँ पढ़ते हुए महज़ पढ़ी नहीं जाती बल्कि मानवीय आन्तरिकता से होकर निकलती महसूस होती हैं ...... पत्नी   google से साभार आजकल उजाला होने से ठीक पहले पत्नी की आँखें देखने लगती हैं पके सावन... Read More...

क्रोध का प्रबंधन, एवं अन्य कविता (रूपाली सिन्हा)

वक्ती हालातों, ज़ज्बातों और संवेदनाओं को शब्दों के सहारे कविता में पिरोने का सार्थक प्रयास करतीं 'रूपाली सिन्हा' की दो कविताएँ .......| - संपादक  क्रोध का प्रबंधन  प्रबंधन के इस युग में सिखाया जा रहा है क्रो... Read More...

परले ज़माने का राजा: कविता (सूरज बडात्या)

हिंदी कविता में प्रखर राजनितिक चेतना और वैज्ञानिक सोच के धनी सूरज बडत्या की कवितायें समय-सापेक्ष हैं और हस्तक्षेप करती हैं अपने समय की चुनौतियों से---संपादक परले ज़माने का राजा !  एक  परले ज़माने की बात है .... Read More...

फेसबुक: नाटक (अनीता चौधरी)

अनीता चौधरी की कलम कविता, कहानी, नाटक जैसी साहित्य की महत्वपूर्ण विधाओं पर सक्रिय है इस कड़ी में आपका एक बाल नाटक ....|  फेसबुक  अनीता चौधरी दृश्य – 1 (घर का दृश्य, शाम का समय है | पिताजी ऑफिस से आते है औ... Read More...

धरती भयानक हो गई ! कविता (प्रमोद बेड़िया)

गहरे अर्थों और प्रतीकों के सहारे जैसे इतिहासबोध, आदमी ... न.. सम्पूर्ण मानव जाति, धरती .... नहीं.... धरतियों का जीवन आलाप | सभ्यता या सभ्यता के प्रस्फुटन के आईने में वर्तमान को देखने समझने का प्रयास करती "प्रमो... Read More...

स्मार्ट सिटी: एवं अन्य कविता (जिजीविषा)

चैनल, टी आर पी, विज्ञापन, शोशल मीडिया, इंटरनेट, बाज़ार और चकाचौंध से बनते स्मार्ट सिटी की आबो-हवा को साँसों से अपने अन्दर खींचते हुए यह याद रख पाना कि, यह सब कितने ही मजबूर और वेवश इंसानों की जान की कीमत पर हासि... Read More...

तब तुम क्या करोगे: कविता (ओमप्रकाश वाल्मीकि)

थोड़ी सी बारिश से देश भर के नगर, कस्बों, गांवों की सड़कें व् आम रास्ते कीचड़ और गन्दगी से भर गए हैं ..... उन्ही कीचड़ भरे रास्तों से निकलते हुए बिना किसी सवाल के लोगों की नाक भोंह सिकुड़ी हुईं हैं ..... इस हालात को ... Read More...