दुख : कहानी (अंतोन चेखव )

एक बार फिर वह खुद को बेहद अकेला महसूस करता है। सन्नाटे से घिरा हुआ... उसका दुख जो थोड़ी देर के लिए कम हो गया था, फिर लौट आता है, और इस बार वह और भी ताकत से उसके हृदय को चीर देता है। बेहद बेचैन हो कर वह सड़क की ... Read More...

राजपूत कैदी : कहानी (तोल्सतोय )

एक दिन आंधी आई। एक घंटा मूसलाधार मेंह बरसा, नदियाँ-नाले भर गए। बाँध पर सात फुट पानी चढ़ आया। जहाँ तहाँ झरने झरने लगे, धार ऐसी प्रबल थी कि पत्थर लु़ढ़के जाते थे। गाँव की गलियों में नदियाँ बहने लगीं। आंधी थम जाने... Read More...

लाल पान की बेगम : कहानी (फणीश्वरनाथ रेणु )

प्रसिद्ध कहानीकार 'फणीश्वरनाथ रेणु ' के जन्मदिवस के अवसर पर उनको याद करते हुए, आइये पढ़ते हैं उनकी कहानी 'लाल पान की बेगम'.....  लाल पान की बेगम फनीश्वरनाथ रेणु क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्य... Read More...

बीस सौ इक्यावन का एक दिन: कहानी (नमिता सिंह)

"मित्र ने बताया कि हिंदुस्तान के विदेशी मित्रों ने देश को लबालब आर्थिक सहायता इस शर्त पर दी थी कि देश से गरीबी हटा दी जाएगी। मित्र राष्ट्रों से पर्यटक आते तो उन्हें गरीबी और भुखमरी को देखकर अच्छा नहीं लगता था। ... Read More...

श्रृंखला : कहानी (अखिलेश)

चिट्ठी, वजूद, श्रृंखला, सोने का चाकू, हाकिम कथा, जैसी कालजयी कहानियों वाले चार कथा संग्रह अँधेरा, आदमी नहीं टूटता, मुक्ति, शापग्रस्त और अन्वेषण, निर्वासन उपन्यास के लेखक, हिंदी के यशस्वी कथाकार "अखिलेख" को 'आनं... Read More...

पागलों ने दुनिया बदल दी: कहानी (रमेश उपाध्याय)

घोर अँधेरे वक़्त की हताशाओं के बीच, संवेदनशील इंसानी धरती की आशाओं के सपने संजोने को, आसान है कि दिवास्वप्न देखना कह दिया जाय किन्तु उजाले की उम्मीदों के यही सपने ही तो हैं जो इंसान को अँधेरे के खिलाफ खड़े रहने औ... Read More...

मुआवज़ा : कहानी (फरीदा ज़माल)

निसंदेह आतंकी या साम्प्रदायिक घटनाओं में जान गवांने वाले निर्दोष लोगों के परिवारों की इन घटनाओं के बाद की स्थितियां बेहद हृदय विदारक और अपूर्णीय होती हैं, लेकिन वहीँ वर्ग विशेष के लिए राजनैतिक हित स्वार्थों के ... Read More...

जस्‍ट डांस: कहानी (कैलाश वानखेड़े)

राजेन्द्र यादव कथा सम्मान २०१७  पाने वाली 'कैलाश वानखेड़े की कहानी "जस्ट डांस" विस्तार लिए महज़ एक कथा शिल्प न होकर वर्तमान वक़्त के सघन जाले से झांकती, विद्रोह से तपती, दमित  दलित आदिवासी आँखें हैं जो सचेतन वर्तम... Read More...

आवाज दे कहां है…!: कहानी (गीताश्री)

वह अपने डर को काबू में रखने की कोशिश करती पर किशोर मन में जो डर की नींव पड़ी थी, उस पर इतनी बड़ी इमारत बन चुकी थी कि वह चाह कर भी उसे गिरा नहीं सकती थी. उसे गिराने के लिए साहस की सुनामी चाहिए थी, जो हो नहीं सकती ... Read More...

मर्द नहीं रोते: कहानी (सूरज प्रकाश)

उन्‍होंने क्‍लर्क के हाथ से फार्म ले लिया है और बड़े बेमन से भर कर वापिस क्‍लर्क की डेस्‍क पर रख दिया है। तब तक क्‍लर्क वापिस आ गया है और फार्म देख रहा है। फार्म देख कर क्‍लर्क बेचैन हो गया है - ये क्‍या? यहा... Read More...