दुख-सुख के साझीदार, ‘मुक्तिबोध’: आलेख (नासिरूद्दीन)

मुक्तिबोध की पैदाइश का सौंवा साल चल रहा है. 2017 में वे सौ साल के होते. तीन दशक पहले सामाजिक बदलाव के आंदोलनों से जुड़े हमारे जैसे नौजवान लड़के-लड़कियां भी जिंदगी के इन्‍हीं पैमानों और कशमकश से गुजरे हैं. उन्‍ह... Read More...

मरना कोई हार नहीं होती: संस्मरण (हरिशंकर परसाई)

प्रमोद मैं और शान्ता भाभी तथा रमेश से सलाह करने दूसरे कमरे में चले गये।इधर मुक्तिबोध ज्ञानरंजन से नये प्रकाशनों पर बात करने लगे। तय हुआ कि जल्दी भोपाल ले चलना चाहिये। मित्रों ने कुछ पैसा जहाँ-तहाँ से भेज दिया ... Read More...