बायपास के पास : व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

‘लेकिन यहाँ पोहे-जलेबी नहीं है..दोस्त नहीं हैं.. गांधी चौराहे का धरना प्रदर्शन नहीं है..लायब्रेरी नहीं है..गोष्ठी नहीं है..कविता नहीं है...इनके बगैर मैं अकेला महसूस करता हूँ यहाँ..!’ साधुराम जी बोले. ‘तो आप दिन... Read More...

गाँधी : संकल्प, शक्ति और अर्थवत्ता (डॉ मोहसिन खान)

वर्तमान में हम भारत को देखें तो ग्रामों के विकास की अवस्था और दुर्दशा स्पष्ट हो जाती है। आज भी कई गांवों में पानी पीने की असुविधा के साथ बिजली, विद्यालय और स्वास्थ्य केन्द्रों का अभाव है। भारत का आज़ादी के बाद अ... Read More...