हमारे गाँव की विधवाएँ: एवं अन्य कवितायेँ (अनुपम सिंह)

वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक बदलाव के बीच किसी कलैंडर की तरह बदलते और गुजरते वर्षों को युवा पीढ़ी खुद के भीतर बढती हताशा के रूप में देखने को विवश है और यह सायास है कि ऐसे में उसकी आंतरिक चेतना असार्गर्भित नगरीय च... Read More...