सूत्रों के हवाले से : व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

निरंतर डिजिटल होते समय में वास्तविक और जीवंत जगत स्मृतियाँ बनता जा रहा है, 'सूत्रों' की मानें तो ..... जी हाँ पहले कभी बेताबी से डाकिया बाबू का इंतजार किया करते थे अब रोज अपलक टीवी निहारा करते हैं देखें आज क्या... Read More...

डिजिटल के भरोसे में: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

‘हर अच्छी चीज का विरोध करने की तुमको आदत हो गयी है. जब हमने सेटेलाईट अंतरिक्ष में भेजा था तब भी तुमने विरोध किया था.अब वही देखो कितनी मदद कर रहा है हमारी. हजार चैनल हैं हमारे घर में. मौसम की जानकारी है. सबको ला... Read More...