बिहार वाली बस : लघुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

"ले, अब मर. कितनी बार कह चुका हूं. बस में सारे बच्चे लेकर मत चलाकर. साला किधर –किधर इस भीड़ में उसे खोजूं. पांच दफा तो आवाज लगा चुका... पर कमीना जो ठहरा – एक चूं की आवाज उससे देते नहीं बन रहा." एक चुप्पी के बाद... Read More...

बारिश में दिल्ली: व्यंग्य (नित्यानन्द गायेन)

कविता की दुनिया में अपनी ख़ास पहचान रखने वाले कलमकार की कलम से निकले व्यंग्य को पढ़ते हुए व्यंग्य में भी एक कवि की उपस्थिति का एहसास तो जरूर होता है लेकिन व्यवस्थापकीय छोटी छोटी खामियों से उत्पन्न होने वाली बड़ी अ... Read More...

बदनाम गलियों में सिसकती कहानियां: आलेख (अमृता ठाकुर)

रात के स्याह अँधेरे में कुचली हुई नागिन सी बिछी सड़कें जितनी काली दिखतीं हैं, दिन के उजाले में भी ये उस कालिख को नहीं छोड़ पातीं, मानो ये शर्मशार हों मानवीय दुनिया के उन कृत्यों और व्यवस्थाओं से जिनकी ये सड़कें न ... Read More...