धरती भयानक हो गई ! कविता (प्रमोद बेड़िया)

गहरे अर्थों और प्रतीकों के सहारे जैसे इतिहासबोध, आदमी ... न.. सम्पूर्ण मानव जाति, धरती .... नहीं.... धरतियों का जीवन आलाप | सभ्यता या सभ्यता के प्रस्फुटन के आईने में वर्तमान को देखने समझने का प्रयास करती "प्रमो... Read More...