लिखो ‘बसंत’ : कविता (के पी अनमोल)

अपने दौर की चिंता चुनौतियां हमेशा ही साहित्य सर्जकों के चित्त में शामिल रहे हैं | अपने समय से मुठभेड़ करती 'के पी अनमोल' की कविता .....| - संपादक   लिखो 'बसंत' के पी अनमोल धर्म को ज़रूरत नहीं होती गधों क... Read More...

मौत के बाद भी आवाज़ ज़िंदा है, ‘गौरी लंकेश’: आलेख (आरिफा एविस)

इस तरह की हत्याओं का ये पहला मामला नहीं हैं. पहले भी आवाज उठाने वालों को मौत के घाट उतार दिया. दाभोलकर ,पनसारे ,कलबर्गी और गौरी लंकेश में एक ही चीज कॉमन थी वो यह कि उनकी आवाज जनता की आवाज बनी थी. शोषित, उत्पीड़ि... Read More...

धर्म: कहानी (सुशील कुमार भारद्वाज)

छोटी छोटी सामाजिक विषमताओं को रचनात्मकता के साथ लघुकथा के रूप में प्रस्तुत करने का कौशल है सुशील कुमार भारद्वाज की कलम में | धार्मिक संकीर्णताओं के ताने बाने में उलझे समाज के बीच से 'इंसानी धर्म' की डोर को तलाश... Read More...