रंगमंच का बदलता स्वरूप: आलेख (अनीश अंकुर)

नाटक, रंगमंच समाज में जनता की आवाज़ बनकर किसी भी प्रतिरोध के रचनात्मक हस्तक्षेप की दिशा में जरूरी और ताकतवर प्रतीक के रूप में मौजूद रहा है | न केवल आज बल्कि उन्नीसवीं शताब्दी में  1857 का  प्रथम स्वाधीनता संग्रा... Read More...