उम्मीद ही तोड़ती है आदमी को हर बार: कविताएँ (नित्यानंद गायेन)

समय के बीच मानव मन की व्याकुल रिक्तता को विवेचित करतीं 'नित्यानंद गायेन' की समय सापेक्ष रचनाएँ .....|  उम्मीद ही तोड़ती है आदमी को हर बार  नित्यानंद गायेन मिटा दिया जाऊंगा एक दिन तुम्हारी डायरी के उस पन... Read More...

यह सभ्यता की कौनसी जंग है !: कवितायें (नित्यानंद गायेन)

उतसव धर्मिता के समय में कवि की चेतन अभिव्यक्ति, आत्ममुग्ध वक़्त को झकझोर कर अपने दौर के यथार्थ पर लाने की हमेशा रचनात्मक कोशिश करती रही है | हालांकि कवि और उसकी अभिव्यक्ति को देश, काल या विचार की परिधि में बाँधन... Read More...

धन कभी काला होता है क्या ? व्यंग्य (नित्यानंद गायेन)

धन कभी काला होता है क्या ?  नित्यानंद गायेन पिछले कई दिनों से मैं अपनी प्रेमिका से दूर होने के गम में एकदम देवदास बना हुआ था | ऊपर से ये बेईमान मौसम मुझे और भी उदास बना दे रहा है था | तो सोचा चलो आज संडे है ... Read More...

मन की व्यथा कथा: व्यंग्य (नित्यानंद गायेन)

मन की व्यथा कथा  नित्यानंद गायेन योग करने के तुरंत बाद ही इन्द्र, मौनेंद्र से मिले | योग को इतना बड़ा इवेंट बनाने के लिए उन्हें बधाई दी और उसी क्षण फादर्स डे मनाने के लिए अपने निजी पायलट रहित विमान को हांकते ... Read More...

आत्महत्या: कविता (नित्यानंद गायेन)

(कभी-कभी अचानक कोई कविता मन-मस्तिष्क में यूं पेवस्त होती है कि बहुत देर तक थरथराता रहता है तन-मन...नित्यानद गायेन ने आत्महत्या जैसे विषय पर भावपूर्ण कविता लिखी है...संपादक) आत्महत्या आत्महत्या पर लिखी गयी ... Read More...