एक जोड़ा झपकती हुई आँखें : कविता (पद्मनाभ गौतम)

हमरंग का संपादकीय आलेख 'विचलन भी है जरुरी ' को पढ़ते हुए 'पद्मनाभ गौतम' को यह अपना भोगा हुआ यथार्थ लगा | और सहज ही उनकी कलम से यह कविता आलेख पर टिपण्णी के रूप में निकली | यह कविता एक पद्मनाभ का ही यथार्थ नहीं लग... Read More...

’ए गुड-सेकेण्ड बॉय : संस्मरण (पद्मनाभ गौतम )

बाजार की एक पुरानी पुस्तकों की दुकान पर रद्दी में इन्द्रजाल चित्रकथा के अंग्रेजी संस्करण के सैकड़ों पुराने अंक मिल गए थे। अपने प्रिय पात्र फैण्टम, मैंण्ड्रेक, रिप किर्बी, लोथार व गार्थ जिन्हें मैं हिन्दुस्तान-टा... Read More...

ए गुड सेकेण्ड बॉय : संस्मरण (पद्मनाभ गौतम)

हिन्दी की पुस्तकों के पीछे जैसे पागल था मैं! पुस्तक-महल से छपी पुस्तक ’संसार के 501 अद्भुत आश्चर्य’ जब बैकुण्ठपुर के बस-स्टैंड की पुस्तक-दुकान पर बिकने आई, तो उसे महीनों तक दुकान के सामने खड़े होकर निहारता रहा व... Read More...

मैं, उस नगर की कविता: अंतिम भाग (पद्मनाभ गौतम)

बदलते और आधुनिक तकनीक में निरंतर बदलते वक़्त में साहित्यिक शुरूआती समय को ऐतिहासिक रूप में संजोना और रचनात्मक र्रोप में सामने आना एक अवसर देता है अपने साहित्यिक, मानवीय अतीत को वर्तमान समय के साथ मूल्यांकन करने ... Read More...

मैं, उस नगर की कविता (संस्मरण -भाग एक), पद्मनाभ गौतम

बदलते और आधुनिक तकनीक में निरंतर बदलते वक़्त में साहित्यिक शुरूआती समय को ऐतिहासिक रूप में संजोना और रचनात्मक र्रोप में सामने आना एक अवसर देता है अपने साहित्यिक, मानवीय अतीत को वर्तमान समय के साथ मूल्यांकन करने ... Read More...