राजा रवि वर्मा: दो फ़िल्में, दो नजरिए : फिल्म समीक्षा (प्रो० विजय शर्मा)

"जब कलाकार और उसकी कृतियों की कहानी किसी दूसरे कैनवस पर उकेरी जाती है तो वहाँ बहुत कुछ बदल जाती है। सच्चाई और कल्पना का मिश्रण एक नई कृति रचता है। यही हुआ है हाल में बनी दो फ़िल्मों में। ‘मकर मञ्ञ्’ और ‘रंग रसिय... Read More...

तीसमार खाँ: कहानी (प्रो० विजय शर्मा)

विभिन्न कलाओं का उदगम श्रोत 'साहित्य' कभी मानव सभ्यता का इतिहास बनता प्रस्तुत हुआ तो कभी सामाजिक यथार्थ के सरल किस्सा गो के रूप नज़र आया तो गंभीर चुहल के लिए सामाजिक, राजनैतिक विषमताओं पर व्यंग्य बाण छोड़ने में भ... Read More...

गोजर: कहानी (प्रो० विजय शर्मा)

यूं तो कहानी बहुत पहले लिखी गई .... लेकिन आज पढ़ते हुए लगता है जैसे हम सब पूरा समाज असहाय गोजर (कांतर) बनता जा रहा है और ऊपर रखी अनचाही ईंट का वज़न लगातार बढ़ रहा है ....... ' विजय शर्मा' की कहानी  गोजर  विजय... Read More...

वारिस: कहानी (प्रो० विजय शर्मा)

"एक बार के हुए दंगों ने जब उन्हें जड़ से उखाड़ दिया तो वे आकर इस मोहल्ले में बस गए। दंगों में उन्हीं जैसे गरीब लोगों का नुकसान हुआ था। उन्हीं जैसे गरीब लोगों के घर में आग लगी थी। उन्हीं जैसे गरीब लोग मारे गए थे। ... Read More...

छोड़छाड़ के अपने सलीम की गली… : आलेख (प्रो० विजय शर्मा)

"प्रेम क्या है? प्रेम में पड़ना क्या होता है? इसे लिख कर व्यक्त नहीं किया जा सकता है फ़िर भी युगों-युगों से प्रेम पर लिखा जाता रहा है, आगे भी लिखा जाता रहेगा। इसे जानने-समझने का एक ही तरीका है आपादमस्तक इसमें डूब... Read More...

किसने बिगाड़ा मुझे: आत्मकथ्य (प्रो० विजय शर्मा)

यूं तो इंसानी व्यक्तित्व के बनने बिगड़ने में हमारे सामाजिक परिवेश की बड़ी भूमिका होती है किन्तु इस बिगड़ने "इंसान बनने" के लिए सामाजिक असमानताओं और विषमताओं के खिलाफ मन में उठते सवालों को न मार कर उनके जबाव खोजने ... Read More...
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‘हमरंग’ की निरंतरता आश्वस्त करती है ! (प्रो0 विजय शर्मा)

हमरंग का एक वर्ष पूरा होने पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-छांट के, हर चौथे या पांचवें दिन प्रकाशित होंगे | हमारे इस प्... Read More...

टू वीमेन: युद्ध काल में स्त्री: आलेख (प्रो0 विजय शर्मा)

''युद्ध का स्त्री पर पड़ने वाले प्रभाव को दिखाने वाली अच्छी फ़िल्मों की संख्या और भी कम है। ‘टू वीमेन’ उन्हीं कुछ बहुत अच्छी फ़िल्मों से एक है। ‘टू वीमेन' उपन्यास युद्ध काल में स्त्री जीवन की विभीषिका का सचित्र, उ... Read More...

शार्लिट ब्रॉन्टी: आज की स्त्री : आलेख (प्रो० विजय शर्मा)

खासकर साहित्य के संदर्भ में, अभिव्यक्ति में स्त्री स्वर तब से शामिल हो रहे थे जब स्त्रियों का लिखना तो दूर शिक्षा प्राप्त करना भी सामाजिक अपराध था | दरअसल गोल-मोल तरीके से समाज स्वीकृत स्थितियों को लिखना या चित... Read More...