‘कही-अनकही’ कविता की : समीक्षात्मक आलेख (निलय उपाध्याय)

                                                                 जिएऔर लिखे के बीच का फ़र्क नीलकमल दिखे और लिखे से झांकने लगे पकडना मेरा गिरेबान मेरे गुनाहो का हिसाब लेना कभी दस्खत मत करना... Read More...

‘इंसान हैं’ : पुस्तक समीक्षा (अरुण श्री)

आजकल एक आम धारणा है कि जिसके हाथ में झंडा है और जिसके जुबान पर नारे हैं उसी का वैचारिक पक्ष सशक्त है । लेकिन लेखक ने ऐसे झंडाबरदारों को नहीं बल्कि उन्हें नायक कहा है जो झंडे और नारे की राजनीती से अलग जमीन पर गु... Read More...

वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे: यात्रावृतांत

विकास या विकास की गति को शब्दों में, किसी सपनीली दुनिया की तरह, अपनी कल्पनाओं की उड़ान से भी एक कदम आगे के स्वरूप का वर्णन कर लें किन्तु यथार्थ के धरातल पर तमाम विकास के दावे और वादे कितना मूर्त रूप ले पाए हैं य... Read More...

वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे- भाग 2

पद्मनाभ गौतम द्वारा लिखे यात्रा वृत्तांत का दूसरा और अंतिम भाग – वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे- भाग 2  पद्मनाभ गौतम एक सप्ताह घर पर पर व्यतीत करने के पश्चात् मैं वापसी की यात्रा के लिए निकल पड़ा। ... Read More...