हमारे समय के धड़कते जीवन की कविताएं: समीक्षा (डॉ० राकेश कुमार)

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के मध्यांतर में प्रदीप मिश्र की कविताएं तेजी से बदलते भारतीय समाज के विविध रंगों को हमारे सामने लाते हैं। वर्तमान समय में भारतीय समाज लोकतंत्र, भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद और निजीकरण की बड़ी ... Read More...

नवें दसकोत्तर हिंदी उपन्यास और भूमंडलीकरण: आलेख (अनीश कुमार)

सांस्कृतिक तर्क के सहारे पूंजीवाद के साम्राज्यवाद का उत्कर्ष ही भूमंडलीकरण है। भारत में भूमंडलीकरण की शुरुआत नब्बे (1990) के दशक से होती है। इस भूमंडलीकरण के दौर में सबसे ज्यादा कोई परास्त और निराश हुआ हो तो वे... Read More...