आवाज दे कहां है…!: कहानी (गीताश्री)

वह अपने डर को काबू में रखने की कोशिश करती पर किशोर मन में जो डर की नींव पड़ी थी, उस पर इतनी बड़ी इमारत बन चुकी थी कि वह चाह कर भी उसे गिरा नहीं सकती थी. उसे गिराने के लिए साहस की सुनामी चाहिए थी, जो हो नहीं सकती ... Read More...

यह नया साल: एवं अन्य कवितायेँ (अनुपम सिंह)

जहाँ एक तरफ नए साल के स्वागत के में पार्टियों और शोर-शराबों का आवेग है वहीँ वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक बदलाव के बीच किसी कलैंडर की तरह बदलते और गुजरते वर्षों को युवा पीढ़ी खुद के भीतर बढती हताशा के रूप में देखन... Read More...

धोखा, माँ एवं अन्य गज़लें : दिलशाद सैदानपुरी

रंग मंच कि दुनिया में प्रवेश करने से पहले आपने 'दिलशाद सैदानपुरी' के नाम से गज़लें लिखना शुरू किया और यह लेखन का सफ़र आज भी जारी है | हमरंग के मंच से कुछ गज़लें आप सभी पाठकों के लिए, हमरंग पर आगे भी यह सफ़र जारी रह... Read More...

एक बिटिया की मनोव्यथा…: कविता (तरसेम कौर)

नए लेखकों को बेहतर मंच प्रदान करना भी हमरंग के उद्देश्यों में शामिल है | इसी पहल के साथ अब तक हमरंग एक नहीं कई नव लेखकों की रचनाएं प्रकाशित कर उन्हें प्रोत्साहित कर चुका है और उनकी कलम निरंतर चल रही है  | आज इस... Read More...

गद्दार कुत्ते: एवं अन्य कविताएँ (दामिनी यादव)

कविता से हमेशा ही सौन्दर्य टपके ऐसा नहीं होता बल्कि विचलन भी होता है जब कविताई बिम्ब हमें अपनी सामाजिक, राजनैतिक स्थितियों के विकृत हालातों के रूप में नज़र आते हैं | लेखकीय दृष्टि से गुज़रता अपने समय और समाज का क... Read More...