दौड़ से बाहर: कविता (मायामृग)

सामाजिक ताने बाने में इंसानी जीवन, एकलता और सामयिक स्पंदन का सूक्ष्म विश्लेषण करती 'माया मृग' की कवितायें.... दौड़ से बाहर  मायामृग मैं दौड़ा नहीं पर बाहर नहीं हूं दौड़ से मेरे हिस्‍से में है एक रास्‍ता, ... Read More...

‘मायामृग’ की दो कविताएँ….

 'मायामृग' की दो कविताएँ.... ठहरी हुई आवाज़ें  मायामृग कुआं नींद में है नहीं लौटेंगी तुम्‍हारी अावाज़ें स्‍वरभक्षी नहीं है कुआं पर दीवारों की दरारों में अटक जाते हैं शब्‍द तो अटक जाते हैं---। जितना ... Read More...