ग्लोबल गांव में रंगकर्म पर संकट: आलेख (राजेश कुमार)

मौजूदा जो हालात है उसमें रंगमंच को विकेन्द्रित करना ही होगा। रंगमंच की स्थानीयता को पहचान देनी होगी। इसके कथ्य और रंगकर्म को सम्मान देना होगा क्योंकि इन्होंने कारपोरेट के सम्मुख घुटने नहीं टेके हैं बल्कि जो व्य... Read More...

वर्तमान सांस्कृतिक परिदृष्य में रंगकर्म की चुनौतियाँ: आलेख (राजेश कुमार)

लेखक और कलाकार आम जनता से अलग-थलग होने लगे। एकांकी जीवन व्यतीत करने लगे। सामूहिकता व्यक्तिवाद में तब्दील होने लगा। मुगालते में रहने लगे कि जनता के बीच जाने की जरूरत क्या है? अगर जनता के विचार की जरूरत भी होगी त... Read More...

अंतिम युद्ध : नाटक (राजेश कुमार)

कइयों बार इन सवालों के व्यूह से गुजरा हूं कि आज जब देश आजाद है, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र यहां स्थापित है, विश्व की राजनीति में लगातार किसी न किसी रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है, कला-सौंदर्य-अंतरिक्ष क... Read More...

सुखिया मर गया भूख से: नाटक (राजेश कुमार)

बेहद प्रासंगिक नाटक 'सुखिया मर गया भूख से' के पूर्ण नाट्यालेख को हमरंग पर प्रकाशित करने का उद्देश्य  देश भर के नाट्यकर्मियों को इस नाटक की सहज उपलब्धता है | बावजूद इसके मंचन से पूर्व लेखकीय अनुमति लेना नैतिक जि... Read More...

‘गांधी ने कहा था’: नाट्य समीक्षा (एस तौहीद शहबाज़)

साम्प्रदायिकता का ख़बर बन जाना ख़तरनाक नहीं है, ख़तरनाक है ख़बरों का साम्प्रदायिक बन जाना। देश में विभिन्न समुदायों में तमाम तनावों और असहज हालातों के बीच राजेश कुमार का नाटक ‘गांधी ने कहा था’ हमेशा प्रासंगिक र... Read More...
रसप्रिया: एकल नाटक (राजेश कुमार)

रसप्रिया, एकल नाटक: (राजेश कुमार)

रसप्रिया, एकल नाटक  राजेश कुमार (कहानी- फणीश्वरनाथ रेणु ) (दूर कहीं से रसप्रिया की दिल छू लेने वाली मद्धिम-मद्धिम सुरीली तान आ रही है ... धीरे-धीरे प्रकाश भी ... जब प्रकाश की तीव्रता महत्तम पर आती है तो एक ... Read More...