जीवन के तमाम रंगों की ग़ज़ल : समीक्षा (प्रदीप कान्त)

हिन्दी ग़ज़ल की वर्तमान पीढ़ी में जिन लोगों ने तेज़ी से अपनी अलग पहचान बनाई है उनमे एक ज़रूरी नाम प्रताप सोमवंशी का भी है| इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी यदि यह कहा जाए कि समकालीन कविता की तरह प्रताप की ग़ज़ल ... Read More...
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‘विभीषण’ केवल ‘घर का भेदिया’…? आलेख (अभिषेक प्रकाश)

आज हम देख सकते हैं कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ किस तरह  चाटुकारिता, स्वार्थलोलुपता व परिवारवाद  के शिकार है।बहुत कम लोग ऐसे हैं जो सच बोलने का साहस रखते है।हर युग मे ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपने हितों से ऊपर उ... Read More...