मासूम से राही मासूम रज़ा तक…: साक्षात्कार (हनीफ मदार)

राही मासूम रजा का नाम वर्तमान युवा वर्ग के बीच से उसी तरह गुमनाम होता जा रहा है जिस तरह प्रेमचन्द, त्रिलोचन शास्त्री, यशपाल, रांगेय राघव, नागार्जुन, मुक्तिबोध  जैसे अनेक नामों से वर्तमान बाजार में भटकी युवा पीढ़... Read More...

नये स्वरों की वाहिका-‘वाड्.मय’ पत्रिका :समीक्षा (डॉ अल्पना सिंह)

इस तीसरे वर्ग जिसे हिजड़ा, छक्का, ख्वाजासरा, किन्नर या थर्ड जेंडर आदि कहा जाता है, को समाज में वह सम्मान और स्थान नहीं मिलता जो अन्य दोनों वर्गों को प्राप्त है। यह वर्ग आज से नहीं बल्कि सदियों से समाज की प्रताड़न... Read More...

हिंदी-उर्दू द्वंद्व और टोपी शुक्ला: आलेख (मोहम्मद हुसैन डायर)

राही मासूम रज़ा की कृतियों के पात्र भाषायी द्वंद्व से जूझते देखे जा सकते हैं। आधा गांव जहां उर्दू और आंचलिक भाषा  में उलझा हुआ है, वहीं टोपी शुक्ला हिंदी उर्दू विवाद पर लंबी बहस कर पाठकों को झकझोर देने वाले संवा... Read More...

सामाजिक परिवर्तन के अंतर्द्वंदऔर आधा गाँव: शोध आलेख

प्रयोगधर्मी साहित्यकार राही मासूम रजा़ ने अपनी लेखनी द्वारा बदलते सामाजिक परिवेश को बहुत ही सूक्ष्मता से शब्दबद्ध किया है। आज से ठीक 50 वर्ष पूर्व सन् 1966 में लिखा गया ‘आधा गाँव’ उपन्यास राही की प्रतिनिधि रचना... Read More...

‘आधा गांव’ का सम्पूर्ण दृष्टा, ‘राही’ साक्षात्कार (एम् फीरोज खान)

उर्दू अदब से शुरू होकर हिंदी साहित्य में बड़ा दख़ल रखने वाले 'राही मासूम रज़ा' के व्यक्तित्व और जीवन संघर्षों का परिचायक खुद उनका विपुल साहित्य है बावजूद इसके आपका नाम और साहित्यिक रचनाएं हमेशा चर्चाओं में रहे हैं... Read More...

हाशिये के विमर्श में सशक्त उपस्थिति: समीक्षालेख (डॉ0 रमाकांत राय)

"राही मासूम रज़ा वाले खंड में ही बकलम खुद राही मासूम रज़ा के कई महत्त्वपूर्ण और अप्रकाशित आलेख भी संकलित किये गए हैं। इन आलेखों से राही मासूम रज़ा के रचनाकार व्यक्तित्व का पता चलता है। सबसे महत्त्वपूर्ण है राही मा... Read More...