नाक के नीचे : आलेख (रूपाली सिन्हा )

समय बीतने के साथ मेरी नाक के नीचे इतनी चीज़ें इकट्ठी हो गयी थीं कि अब देखने में मुश्किल होने लगी थी। आहिस्ता आहिस्ता मानो नज़र धुंधली पड़ने लगी थी और ज़बान? जब नज़र ही साफ़ न हो तो बोलने का क्या अर्थ रहता है? वैसे भी... Read More...

स्मृतियाँ एवं अन्य कवितायें : रूपाली सिन्हा

वर्तमान समय की भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में कुछ सुनहले पल, यादों की पोटली लिए मन के किसी कोने को थामे रहते है जब भी थकती साँसों को थोड़ा आरम की जरुरत होती हैं, यही यादें उन्हें संबल के रूप में पुनर्जीवित कर देती है |... Read More...

क्रोध का प्रबंधन, एवं अन्य कविता (रूपाली सिन्हा)

वक्ती हालातों, ज़ज्बातों और संवेदनाओं को शब्दों के सहारे कविता में पिरोने का सार्थक प्रयास करतीं 'रूपाली सिन्हा' की दो कविताएँ .......| - संपादक  क्रोध का प्रबंधन  प्रबंधन के इस युग में सिखाया जा रहा है क्रो... Read More...

घर वापसी : एवं अन्य कवितायेँ

ये कवितायें एक तरफ जीवन से रूप,रंग गंध लेती हैं तो दूसरी तरफ समाज की नब्ज़ पर भी हाथ रखती हैं। पितृसत्ता के आवरण में चलने वाले शोषण और फरेब के अनेक रूपों को अनावृत्त करती हैं, सवाल उठती हैं। 'रूपाली सिन्हा' की  ... Read More...