लोकतंत्र बचेगा तभी हम बचेंगे: (डॉ० नमिता सिंह)

ये समझा जाता रहा है कि पत्रकार जनता की धड़कन पहचानते हैं और उसे शब्द देते हैं। वे एक प्रकार से जनता के प्रतिनिधि बन कर सत्ता और समाज के बीच सेतु होते हैं और इसीलिये लोकतंत्र के तीन अंगों विधायिका, कार्यपालिका और... Read More...

भगवान् भरोसे…: व्यंग्य (हनीफ मदार)

किसी भी व्यंग्य रचना की सार्थकता वक्ती तौर पर उसकी प्रासंगिकता में अंतर्निहित होती है | यही कारण है कि हरिशंकर परसाई, शरद जोशी आदि को पढ़ते हुए  हम उसमें अपने वर्तमान के सामाजिक, राजनैतिक अक्स  देखते हैं | हालां... Read More...
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रीयल राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स, सवालों में ! आलेख (अभिषेक प्रकाश)

तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों के खोखलेपन से उत्पन्न रिक्तता में पाँव पसारते वर्तमान में शेक्सपीयर का वह वाक्य याद आता है जिसमे वह कहतें है कि-- 'अगर आप उसे पराजित करना चाहते हैं तो आपको उसकी यादाश्त को मिटा देन... Read More...