मानवीय करुणा का उच्च शिखर है परसाई का व्यंग्य: आलेख (सुरेश क़ांत)

जीवन की व्याख्या के लिए एक विचारधारा की अनिवार्यता बताते हुए परसाई लिखते हैं, “एक ही बात की व्याख्या भिन्न-भिन्न लोगों के लिए भिन्न-भिन्न होती है. इसलिए एक विचारधारा जरूरी है, जिससे जीवन का ठीक विश्लेषण हो सके ... Read More...

इन्स्पेक्टर मातादीन चाँद पर: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

पूछा जाएगा, इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर क्यों गए थे? टूरिस्ट की हैसियत से या किसी फरार अपराधी को पकड़ने? नहीं, वे भारत की तरफ़ से सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अंतर्गत गए थे. चाँद सरकार ने भारत सरकार को लिखा था- यों ह... Read More...

इस युग का कमाल, पुस्तक मेले का हाल : शक्ति प्रकाश

वहां एक लेखक मंच भी था, यूँ खासा फोटोजैनिक था लेकिन सार्वजनिक शौचालय से बिलकुल लगा हुआ, कई आम आदमी जब शौचालय से निकल मंच के पास प्रकट होते तो उनका हाथ जिप पर आसानी से देखा जा सकता था। लेखक और सार्वजनिक शौचालय ए... Read More...

मरने के अलग-अलग स्टैंडर्ड : व्यंग्य (सुजाता तेवतिया)

जीवन भर पेटभर रोटी नहीं ..... बाद मरने के ख्वाब सुहाने |  बाज़ार के सपनीले सब्जबाग की गांठे खोलने का प्रयास करता 'सुजाता तेवतिया' का व्यंग्य ...... कबीर की इस लाइन के साथ “हम न मरै मरिहै संसारा हमको मिला जियावन ... Read More...

नई थैरेपी…: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

'यह सब आपके  तथाकथित विकास का परिणाम है। विकास के  नाम पर पूरा शहर खोद रखा है।सड़कों पर गड्‌ढे ही गड्‌ढे हैं,पुरानी सड़कों की रिपेयरिंग भी मात्र दिखाने के  लिए ही होती है,कुछ  दिनों में ही सड़केँ  फिर उखड़ जाती ह... Read More...

क्रांतिकारी की कथा: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

क्रांतिकारी की कथा ‘क्रांतिकारी’ उसने उपनाम रखा था। खूब पढ़ा-लिखा युवक। स्वस्थ सुंदर। नौकरी भी अच्छी। विद्रोही। मार्क्स-लेनिन के उद्धरण देता, चे ग्वेवारा का खास भक्त। कॉफी हाउस में काफी देर तक बैठता। खूब बातें... Read More...

‘हिंदी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्ताँ हमारा’: व्यंग्य (आरिफा एविस)

"हिंदी दिवस" पर विशेष..... 'आरिफा एविस' की हिंदी व्यंग्य रचना..... और क्या बताऊँ  अम्मा!  कालेज पूरा किया तो नौकरी की तलाश शुरू की. नौकरी मिलती कहाँ आजकल, जॉब मिलती है .पर चाहिए वहां भी अंग्रेजी ही. एक रिशेप्श... Read More...

भगवान् भरोसे…: व्यंग्य (हनीफ मदार)

किसी भी व्यंग्य रचना की सार्थकता वक्ती तौर पर उसकी प्रासंगिकता में अंतर्निहित होती है | यही कारण है कि हरिशंकर परसाई, शरद जोशी आदि को पढ़ते हुए  हम उसमें अपने वर्तमान के सामाजिक, राजनैतिक अक्स  देखते हैं | हालां... Read More...

सूत्रों के हवाले से : व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

निरंतर डिजिटल होते समय में वास्तविक और जीवंत जगत स्मृतियाँ बनता जा रहा है, 'सूत्रों' की मानें तो ..... जी हाँ पहले कभी बेताबी से डाकिया बाबू का इंतजार किया करते थे अब रोज अपलक टीवी निहारा करते हैं देखें आज क्या... Read More...

मुल्ला जी की गाय : व्यंग्य (अनीता मिश्रा)

टुन्ना पंडित को ये समस्या राम मंदिर जैसी बड़ी पेचीदा समस्या लगी इसलिए तत्काल एक पुड़िया निकाली.. मुहं में डाल कर बोले..मुल्ला जी समस्या बहुत कठिन है, वो भी आजकल के माहौल में...अब मोहल्ले की बात है तो कुछ तो करना ... Read More...