बायपास के पास : व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

‘लेकिन यहाँ पोहे-जलेबी नहीं है..दोस्त नहीं हैं.. गांधी चौराहे का धरना प्रदर्शन नहीं है..लायब्रेरी नहीं है..गोष्ठी नहीं है..कविता नहीं है...इनके बगैर मैं अकेला महसूस करता हूँ यहाँ..!’ साधुराम जी बोले. ‘तो आप दिन... Read More...

शौचालय चिंतन: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

मोहनजोदाडो और हड्डप्पा की खुदाई में जो तत्कालीन सभ्यता के अवषेश मिले थे। उनमें स्नानागार की पुष्टी तो होती है किंतु मनुष्यों के निवृत्त होने की क्या व्यवस्था रही होगी, इसके बारे में जानकारी अस्पष्ट ही है।  हाँ,... Read More...

आवारा भीड़ के खतरे: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

युवक साधारण कुरता पाजामा पहिने था। चेहरा बुझा था जिसकी राख में चिंगारी निकली थी पत्थर फेंकते वक्त। शिक्षित था। बेकार था। नौकरी के लिए भटकता रहा था। धंधा कोई नहीं। घर की हालत खराब। घर में अपमान, बाहर अवहेलना। वह... Read More...

दो नाक वाले लोग: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

"कुछ नाकें गुलाब के पौधे की तरह होती हैं। कलम कर दो तो और अच्छी शाखा बढ़ती है और फूल भी बढ़िया लगते हैं। मैंने ऐसी फूलवाली खुशबूदार नाकें बहुत देखीं हैं। जब खुशबू कम होने लगती है, ये फिर कलम करा लेते हैं, जैसे ... Read More...
(हनीफ मदार)

ऐसे में लेखक बेचारा करे भी क्या…?: संपादकीय (हनीफ मदार)

ऐसे में लेखक बेचारा करे भी क्या...?  हनीफ मदार इधर हम छियासठवें गणतंत्र में प्रवेश कर रहे हैं | अंकों के लिहाज़ से इस गणतंत्र वर्ष के शुरूआत 1 जनवरी २०१६ से पूरे हफ्ते हमरंग पर एक भी पोस्ट या रचना प्रकाशित नह... Read More...

फिर बच जाएंगे रंगों से : व्यंग्य(ब्रजेश कानूनगो)

होली पर विशेष ...... होली की अशीम बधाइयों के साथ ..... हमरंग के पाठकों के लिए  फिर बच जाएंगे रंगों से ब्रजेश कानूनगो मेरा विश्वास है कि वे इस बार भी रंगों से ठीक उसी तरह बच निकलेंगे जिस तरह हर साल अपने आप क... Read More...

बहिष्कारी तिरस्कारी व्यापारी : व्यंग्य (आरिफा एविस)

भारत एक त्यौहारों वाला देश है तब ऐसे सीजन में त्यौहारी वक्तव्यों का सीजन न हो ऐसे कैसे हो सकता है? यूँ तो हमें किसी बात से गुरेज नहीं लेकिन कोई अगर हमारे दुश्मन की तरफदारी करेगा तो उसका बहिष्कार करना जरूरी है. ... Read More...

योग के बहाने : व्यंग्य (आरिफा एविस)

पड़ोस में रहने वाले चंदू ने कहा, ‘क्या कभी भोग दिवस भी मनाया जाता है?  रोज कोई न कोई डे हो और लोगों को बदले में कुछ मिले. चाचा अगर भोग दिवस होगा तो लोगो को तरह तरह का खाने को मिलेगा. जिन्हें कभी वो चीजें नसीब न ... Read More...

मानसून सत्र की गलबहियां : व्यंग्य (एम्0 एम्0 चंद्रा)

व्यंग्य, वर्तमान राजनैतिक और सामाजिक स्थितियों पर रचनात्मक तरीके से बात करने का एक बेहतर माद्ध्य्म है .... और यदि व्यंग्य रचना एकदम ताज़ा हो तो रचनात्मक उर्जा पाठक को निश्चित ही आन्नदित करती है ऐसी ही ताजगी से ल... Read More...