मन की व्यथा कथा: व्यंग्य (नित्यानंद गायेन)

मन की व्यथा कथा  नित्यानंद गायेन योग करने के तुरंत बाद ही इन्द्र, मौनेंद्र से मिले | योग को इतना बड़ा इवेंट बनाने के लिए उन्हें बधाई दी और उसी क्षण फादर्स डे मनाने के लिए अपने निजी पायलट रहित विमान को हांकते ... Read More...

बारिश में दिल्ली: व्यंग्य (नित्यानन्द गायेन)

कविता की दुनिया में अपनी ख़ास पहचान रखने वाले कलमकार की कलम से निकले व्यंग्य को पढ़ते हुए व्यंग्य में भी एक कवि की उपस्थिति का एहसास तो जरूर होता है लेकिन व्यवस्थापकीय छोटी छोटी खामियों से उत्पन्न होने वाली बड़ी अ... Read More...

डिजिटल के भरोसे में: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

‘हर अच्छी चीज का विरोध करने की तुमको आदत हो गयी है. जब हमने सेटेलाईट अंतरिक्ष में भेजा था तब भी तुमने विरोध किया था.अब वही देखो कितनी मदद कर रहा है हमारी. हजार चैनल हैं हमारे घर में. मौसम की जानकारी है. सबको ला... Read More...

अब बनाएँ सदाचार का टीका : व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

अब बनाएँ सदाचार का टीका <a href="http://www.humrang viagra generique doctissimo.com/?attachment_id=1695" rel="attachment wp-att-1695">ब्रजेश कानूनगो साधुरामजी उस दिन बडे परेशान लग रहे थे। कहने लगे ‘द... Read More...

बायपास के पास : व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

‘लेकिन यहाँ पोहे-जलेबी नहीं है..दोस्त नहीं हैं.. गांधी चौराहे का धरना प्रदर्शन नहीं है..लायब्रेरी नहीं है..गोष्ठी नहीं है..कविता नहीं है...इनके बगैर मैं अकेला महसूस करता हूँ यहाँ..!’ साधुराम जी बोले. ‘तो आप दिन... Read More...

शौचालय चिंतन: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

मोहनजोदाडो और हड्डप्पा की खुदाई में जो तत्कालीन सभ्यता के अवषेश मिले थे। उनमें स्नानागार की पुष्टी तो होती है किंतु मनुष्यों के निवृत्त होने की क्या व्यवस्था रही होगी, इसके बारे में जानकारी अस्पष्ट ही है।  हाँ,... Read More...

आवारा भीड़ के खतरे: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

युवक साधारण कुरता पाजामा पहिने था। चेहरा बुझा था जिसकी राख में चिंगारी निकली थी पत्थर फेंकते वक्त। शिक्षित था। बेकार था। नौकरी के लिए भटकता रहा था। धंधा कोई नहीं। घर की हालत खराब। घर में अपमान, बाहर अवहेलना। वह... Read More...

दो नाक वाले लोग: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

"कुछ नाकें गुलाब के पौधे की तरह होती हैं। कलम कर दो तो और अच्छी शाखा बढ़ती है और फूल भी बढ़िया लगते हैं। मैंने ऐसी फूलवाली खुशबूदार नाकें बहुत देखीं हैं। जब खुशबू कम होने लगती है, ये फिर कलम करा लेते हैं, जैसे ... Read More...
(हनीफ मदार)

ऐसे में लेखक बेचारा करे भी क्या…?: संपादकीय (हनीफ मदार)

ऐसे में लेखक बेचारा करे भी क्या...?  हनीफ मदार इधर हम छियासठवें गणतंत्र में प्रवेश कर रहे हैं | अंकों के लिहाज़ से इस गणतंत्र वर्ष के शुरूआत 1 जनवरी २०१६ से पूरे हफ्ते हमरंग पर एक भी पोस्ट या रचना प्रकाशित नह... Read More...

फिर बच जाएंगे रंगों से : व्यंग्य(ब्रजेश कानूनगो)

होली पर विशेष ...... होली की अशीम बधाइयों के साथ ..... हमरंग के पाठकों के लिए  फिर बच जाएंगे रंगों से ब्रजेश कानूनगो मेरा विश्वास है कि वे इस बार भी रंगों से ठीक उसी तरह बच निकलेंगे जिस तरह हर साल अपने आप क... Read More...