बायपास के पास : व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

‘लेकिन यहाँ पोहे-जलेबी नहीं है..दोस्त नहीं हैं.. गांधी चौराहे का धरना प्रदर्शन नहीं है..लायब्रेरी नहीं है..गोष्ठी नहीं है..कविता नहीं है...इनके बगैर मैं अकेला महसूस करता हूँ यहाँ..!’ साधुराम जी बोले. ‘तो आप दिन... Read More...

”रवीन्द्र के. दास का एकल कविता-पाठ”

''रवीन्द्र के. दास का एकल कविता-पाठ'' साभार गूगल 'स्त्रीवादी भजन'' पाँच मर्दों ने मिलकर स्त्रीवादी भजन गाए दर्शकों में बैठी स्त्रियाँ मुस्कुराईं इस तरह हुआ स्त्रीवादी कविता का प्रदर्शन कुछ मर्द होत... Read More...

गोद में गांव , शहर बने स्मार्ट: व्यंग्य (आरिफा एविस)

‘भाई मेरे अब जमाना बदल रहा है. जब स्मार्ट फ़ोन, स्मार्ट टी.वी और स्मार्ट लोग हो सकते हैं तो स्मार्ट सिटी भी बन जाने पर कम से कम कुछ लोगों का तो भला होगा ही. उनसे ही रिस रिस कर विकास की गंगा गांवों तक आएगी और भार... Read More...