पागलों ने दुनिया बदल दी: कहानी (रमेश उपाध्याय)

घोर अँधेरे वक़्त की हताशाओं के बीच, संवेदनशील इंसानी धरती की आशाओं के सपने संजोने को, आसान है कि दिवास्वप्न देखना कह दिया जाय किन्तु उजाले की उम्मीदों के यही सपने ही तो हैं जो इंसान को अँधेरे के खिलाफ खड़े रहने औ... Read More...

बसेरे से दूर: विजन, शिल्प एवं भाषा: आलेख (नितिका गुप्ता)

"डाॅ. हरिवंशराय ने अपनी आत्मकथा का तीसरा खंड ‘बसेरे से दूर‘ 1971 से 1977 के दौरान लिखा। इस खंड में उनके इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग में अध्यापक होने, देश-परिवार से दूर जाकर ईट्स के साहित्य पर शोध ... Read More...