विचलन भी है जरूरी: ‘हमरंग’ संपादकीय (हनीफ़ मदार)

विचलन भी है जरूरी  हनीफ मदार कल चाय की एक गुमटी पर दो युवाओं से मुलाक़ात हुई दोनों ही किन्ही मल्टीनेशनल कम्पनियों में कार्यरत हैं | इत्तेफाक से दोनों ही कभी मेरे स्टूडेंट रहे हैं | उन्होंने मुझे पहचान लिया औ... Read More...

हिंदी को जरूरत है एक “क्यों” की: संपादकीय (हनीफ मदार)

हिंदी को जरूरत है एक “क्यों” की  हनीफ मदार फिर से हिंदी दिवस पर मैं असमंजस में हूँ हर साल की तरह, ठीक वैसे ही जैसे हर वर्ष मदर्स डे, फादर्स डे…….लम्बी सी लिस्ट है (कुछ और का आविष्कार और हो गया होगा, उसकी जान... Read More...

वह किसान नहीं है….?: (हनीफ मदार)

वह किसान नहीं है….?  हनीफ मदार किसान और किसानी पर बातें तो खूब होती रहीं हैं उसी तादाद में होती रही हैं किसानों की आत्महत्याएं | बावजूद इसके कोई ठोस नीति किसानों के हक़ में अब तक नहीं बन पाई | हालांकि ऐसा भी ... Read More...

रहिमन पानी राखिये…: संपादकीय (अनीता चौधरी)

रहिमन पानी राखिये...  अनीता चौधरी मनुष्य को जीवन जीने के लिए मुख्य रूप से तीन चीजों की जरुरत होती है हवा, पानी और भोजन | जिस तरह से हवा और भोजन के बिना जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती उसी प्रकार पानी के बि... Read More...

साहित्यिक वैचारिकी को आगे बढ़ाने का सगल, ‘हमरंग’: (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

हमरंग के दो वर्ष पूरा होने पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-छांट के, हर चौथे या पांचवें दिन प्रकाशित होंगे | हमारे इस प्... Read More...

अप्रभावी होता ‘सांस्कृतिक आंदोलन’ (हनीफ मदार)

अप्रभावी होता ‘सांस्कृतिक आंदोलन’  हनीफ मदार आज जिस दौर में हम जी रहे हैं वहां सांस्कृतिक आंदोलन की भूमिका पर सोचते हुए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि एक दूसरे के पूरक दो शब्दों के निहितार्थाें के पुनर... Read More...
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नहीं टूटेगा आपका भरोसा….: संपादकीय (हनीफ मदार)

नहीं टूटेगा आपका भरोसा....  हनीफ मदार किसी भी लेखक की पूँजी उसका रचनाकर्म होता है | अपनी रचनाओं को संजोने के लिए लेखक अपनी जिंदगी के उन क्षणों को अपने लेखन के लिए आहूत करता है जो आम तौर पर अपने निजत्व या अपन... Read More...
मैं पीछे क्यों रहूँ

प्रेम-गली अति सांकरी…: संपादकीय (अनीता चौधरी)

प्रेम-गली अति सांकरी... बसंत और मधुमास से गुज़रते हुए दृष्टि, वर्तमान समय में राजनैतिक इच्छाशक्ति के चलते पूरे सामाजिक परिवेश में एक ख़ास तरह के बदलाव पर आकर ठहर जाती है | ऐसा महसूस होने लगा है कि चारों तरफ अतार... Read More...
(हनीफ मदार)

ऐसे में लेखक बेचारा करे भी क्या…?: संपादकीय (हनीफ मदार)

ऐसे में लेखक बेचारा करे भी क्या...?  हनीफ मदार इधर हम छियासठवें गणतंत्र में प्रवेश कर रहे हैं | अंकों के लिहाज़ से इस गणतंत्र वर्ष के शुरूआत 1 जनवरी २०१६ से पूरे हफ्ते हमरंग पर एक भी पोस्ट या रचना प्रकाशित नह... Read More...

‘कल्चर ऑफ साइलेंस’: संपादकीय (मज्कूर आलम)

‘कल्चर ऑफ साइलेंस’  मज्कूर आलम तमाम हंगामों और तमाशों के बीच साल 2015 समाप्त हो गया। इस बीच साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक सारोकार की पैरोकारी के लिए बना वेबपोर्टल 'हमरंग डॉट कॉम' ने भी पिछले ही महीने अपना एक ... Read More...