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365 दिन के सफ़र में “हमरंग”: संपादकीय (हनीफ मदार)

365 दिन के सफ़र में “हमरंग”  हनीफ मदार साथियो जहाँ समय का अपनी गति से चलते रहना प्राकृतिक है, वहीँ वक्ती तौर पर चलते हुए अपने निशान छोड़ना इंसानी जूनून है | वक़्त के उन्हीं पदचापों के अनेक खट्टे-मीठे, अहसासों ... Read More...

आखिर क्या लिखूं…..?: संपादकीय (हनीफ मदार)

आखिर क्या लिखूं.....?  हनीफ मदार कितना तकलीफ़देह होता है उस स्वीकारोक्ति से खुद का साक्षात्कार, जहाँ आपको एहसास हो कि जिस चीज़ की प्राप्ति या तलाश में आप अपना पूरा जीवन और सम्पूर्ण व्यक्तित्व दाँव पर लगाए रहे,... Read More...
मैं पीछे क्यों रहूँ

महावारी या महामारी: संपादकीय (अनीता चौधरी)

एक बात जो मुझे बचपन से लेकर आज तक मेरे ही घर में चुभती रही है, जब भी मुझे मासिक धर्म शुरू होता है मेरी माँ मुझे अपने पूजा वाले कमरे में नहीं जाने देती हैं। मुझे बहुत खराब लगता है । मैंने उन्हें बहुत समझाने की क... Read More...
मैं पीछे क्यों रहूँ

स्त्री आत्मनिर्भर क्यों बने…?: संपादकीय (अनीता चौधरी)

स्त्री आत्मनिर्भर क्यों बने…?  अनीता चौधरी मेरे पड़ोस में रहने वाली बीस वर्षीय सुमन को उसके पति की दिमागी हालत ठीक न होने की वजह से ससुराल वालों ने घर से बाहर निकाल दिया है | वह पिछले करीब अठारह महीनों से अपन... Read More...