पढ़ने-गुनने की जगह : संस्मरण (राजेश उत्साही)

"1985 में जब चकमक शुरू हुई तो किताबों से बिलकुल अलग तरह का रिश्‍ता शुरू हुआ।  हर महीने चकमक के लिए सामग्री जुगाड़ने, तैयार करने के लिए घंटों इस पुस्‍तकालय में लगाने होते थे।  तो यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि... Read More...

हरिशंकर परसाई को मेरा जानना और समझना: संस्मरण (ब्रजेश कानूनगो)

इंदौर से निकलने वाले 'नईदुनिया' अखबार का 70-80 कभी बड़ा महत्त्व हुआ करता था. बल्कि यह अखबार पत्रकारिता, साहित्यिक पत्रकारिता के स्कूल की तरह भी जाना जाता रहा. हिन्दी के बहुत महत्वपूर्ण सम्पादक, सर्वश्री राहुल बा... Read More...

’ए गुड-सेकेण्ड बॉय : संस्मरण (पद्मनाभ गौतम )

बाजार की एक पुरानी पुस्तकों की दुकान पर रद्दी में इन्द्रजाल चित्रकथा के अंग्रेजी संस्करण के सैकड़ों पुराने अंक मिल गए थे। अपने प्रिय पात्र फैण्टम, मैंण्ड्रेक, रिप किर्बी, लोथार व गार्थ जिन्हें मैं हिन्दुस्तान-टा... Read More...

ए गुड सेकेण्ड बॉय : संस्मरण (पद्मनाभ गौतम)

हिन्दी की पुस्तकों के पीछे जैसे पागल था मैं! पुस्तक-महल से छपी पुस्तक ’संसार के 501 अद्भुत आश्चर्य’ जब बैकुण्ठपुर के बस-स्टैंड की पुस्तक-दुकान पर बिकने आई, तो उसे महीनों तक दुकान के सामने खड़े होकर निहारता रहा व... Read More...

शांतिनिकेतन की यात्रा : संस्मरण (बाबा मायाराम)

यहां घूमते घामते मैं सोच रहा था, क्या जरूरत थी टेगौर जैसे संभ्रांत वर्ग के व्यक्ति को जंगल में रहने की और शांतिनिकेतन की स्थापना की। इसका जवाब उनके लिखे लेखों में मिलता है। वे भारत में बाबू बनाने वाली शिक्षा से... Read More...

मैं, उस नगर की कविता: संस्मरण, दूसरा भाग (पद्मनाभ गौतम)

बदलते और आधुनिक तकनीक में निरंतर बदलते वक़्त में साहित्यिक शुरूआती समय को ऐतिहासिक रूप में संजोना और रचनात्मक रूप में सामने आना एक अवसर देता है अपने साहित्यिक, मानवीय अतीत को वर्तमान समय के साथ मूल्यांकन करने का... Read More...

मैं, उस नगर की कविता (संस्मरण -भाग एक), पद्मनाभ गौतम

बदलते और आधुनिक तकनीक में निरंतर बदलते वक़्त में साहित्यिक शुरूआती समय को ऐतिहासिक रूप में संजोना और रचनात्मक र्रोप में सामने आना एक अवसर देता है अपने साहित्यिक, मानवीय अतीत को वर्तमान समय के साथ मूल्यांकन करने ... Read More...

मरना कोई हार नहीं होती: संस्मरण (हरिशंकर परसाई)

प्रमोद मैं और शान्ता भाभी तथा रमेश से सलाह करने दूसरे कमरे में चले गये।इधर मुक्तिबोध ज्ञानरंजन से नये प्रकाशनों पर बात करने लगे। तय हुआ कि जल्दी भोपाल ले चलना चाहिये। मित्रों ने कुछ पैसा जहाँ-तहाँ से भेज दिया ... Read More...

किसने बिगाड़ा मुझे: आत्मकथ्य (डा० विजय शर्मा)

यूं तो इंसानी व्यक्तित्व के बनने बिगड़ने में हमारे सामाजिक परिवेश की बड़ी भूमिका होती है किन्तु इस बिगड़ने “इंसान बनने” के लिए सामाजिक असमानताओं और विषमताओं के खिलाफ मन में उठते सवालों को न मार कर उनके जबाव खोजने ... Read More...