समाज की तृष्णा अनदेखी रह गई.. : फिल्म समीक्षा (सैयद एस तौहीद)

समाज की तृष्णा अनदेखी रह गई..  एस तौहीद शहबाज़ प्रेम रतन की परिभाषा एवम दायरा इतना अधिक सीमित नही होना चाहिए जितना कि हालिया रीलिज 'प्रेम रतन धन पायो' या उसके समान फिल्मों में पेश किया जाता है. प्रेम एहसान तथ... Read More...

मीठा कुनैन नहीं स्त्री विमर्श: आलेख (ज्योति कुमारी)

‘‘पुरुष भी विचित्र है। वह अपने छोटे से सुख के लिए स्त्री को बड़ा से बड़ा दुख दे डालता है और ऐसी निश्चिंतता से, मानो वह स्त्री को उसका प्राप्य ही दे रहा है। सभी कर्तव्यों को वह चीनी से ढकी कुनैन के समान मीठे-मीठे ... Read More...