जब ग़ज़ल मेहराबान होती है: समीक्षालेख (प्रदीप कांत)

कभी कतील शिफाई ने कहा था- लाख परदों में रहूँ, भेद मेरे खोलती है, शायरी सच बोलती है| अशोक भी इस तरह के सच का सामना करने की हिम्मत रखते हैं तभी कह पाते हैं-  "मुझे ज़रूर कोई जानता है अन्दर तक मेरे खिलाफ़ ये सच्चा... Read More...