विकासोन्मुख गांव की जातिगत समस्या है : ‘चाँद के पार एक चाभी’ “समीक्षा”

'हमरंग' पर प्रकाशित हुई 'अवधेश प्रीत की कहानी 'चाँद के पार एक चाभी' को पढने के बाद कहानी के वर्तमान सामाजिक निहितार्थों पर एक विवेचनात्मक आलेख 'सुशील कुमार भारद्वाज' की कलम से .....| विकासोन्मुख गांव की जाति... Read More...

‘अट्टहास’ पत्रिका का नया प्रयोग: समीक्षा (आरिफा एविस)

पिछले काफी समय से नये और पुराने व्यंग्यकारों के लेखन पर सवाल उठ रहे हैं, जिन्हें या तो सिरे से नकार दिया जा रहा है या छपास की श्रेणी में डाला दिया जाता है. अकसर हाल फ़िलहाल लिखे जा रहे व्यंग्यों को सपाट बयानी कह... Read More...

“शास्त्र से संवाद” : समीक्षा (अभिषेक कुमार उपाध्याय)

प्रस्तुत पुस्तक 'नामवर के नोट्स' संपूर्ण व्याख्यान नहीं बल्कि सिर्फ नोट्स हैं जो कि स्मृति के ज्ञानात्मक आधार का साक्ष्य प्रस्तुत करती है। कुल दस अध्यायों में संकलित व्याख्यान 'संस्कृत काव्यशास्त्र के स्वरुप नि... Read More...

नये स्वरों की वाहिका-‘वाड्.मय’ पत्रिका :समीक्षा (डॉ अल्पना सिंह)

इस तीसरे वर्ग जिसे हिजड़ा, छक्का, ख्वाजासरा, किन्नर या थर्ड जेंडर आदि कहा जाता है, को समाज में वह सम्मान और स्थान नहीं मिलता जो अन्य दोनों वर्गों को प्राप्त है। यह वर्ग आज से नहीं बल्कि सदियों से समाज की प्रताड़न... Read More...

वो हत्या जिसने सोवियत संघ को हिला दिया : समीक्षा (अनीश अंकुर)

सर्गेई मिसनोविज किरोव का हत्यारा निकोलायेव एक अकेला इंसान था। किरोव की हत्या के पीछे साजिश न थी, कोई गुप्त आतंकवादी नेटवर्क सक्रिय नहीं था, जैसा कि तीस के दशक समझा जा रहा था। तीनों इस राय से एकमत हैं कि स्टालिन... Read More...

जिनकी दुआ को तरसे जमाना, उन्हें भी दुआ नसीब हो : समीक्षा लेख (पद्मा शर्मा)

जीवन जीने के लिए शरीर के समस्त अंग और अवयव अपनी-अपनी अहमियत रखते हैं। शरीर का कोई भी अंग यदि अपूर्ण है तो जीवन की दौड़ में कई बाधाएँ उपस्थित हो जाती हैं। समाज की विवाह संस्था की मूल धुरी पर आधारित जिन शारीरिक अव... Read More...

‘इंसान हैं’ : पुस्तक समीक्षा (अरुण श्री)

आजकल एक आम धारणा है कि जिसके हाथ में झंडा है और जिसके जुबान पर नारे हैं उसी का वैचारिक पक्ष सशक्त है । लेकिन लेखक ने ऐसे झंडाबरदारों को नहीं बल्कि उन्हें नायक कहा है जो झंडे और नारे की राजनीती से अलग जमीन पर गु... Read More...

एक संस्कृति के उत्थान और पतन की कहानी, ‘कोठागोई’ (सुशील कुमार भारद्वाज)

इन दिनों चर्चा में 'प्रभात रंजन' की किताब "कोठागोई" पर एक समीक्षात्मक आलेख ...... एक संस्कृति के उत्थान और पतन की कहानी, 'कोठागोई' सुशील कुमार भारद्वाज प्रभात रंजन की नयी किताब “कोठागोई” के आने की खबर मात्र... Read More...

जीवन में बसती हैं कविताएँ: समीक्षा (सुरेश उपाध्याय)

ब्रजेश कानूनगो की कविताओं पर बात करने के लिए कवि के अपने परिवेश और क्रमिक विकास को समझना एक बेहतर उपाय हो सकता है। कविताओं में उनकी सरल भाषा, सहज सम्प्रेषणीयता, अपने आस-पास के सन्दर्भों से उठाई विषय वस्तु और प्... Read More...

स्‍त्री मन के सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलतीं कहानियां : अमृता ठाकुर

पंखुरी की कहानियां स्त्री विमर्श का हिस्सा हैं, इस बयान को हालांकि खारिज नहीं किया जा सकता, क्यों कि वे स्‍त्री मन के अत्यंत सूक्ष्म मनोभावों को परत दर परत खोलती चली जाती हैं। उनके मनोभावों में  कहीं कोई जटिलता... Read More...