बाज़ार और साम्प्रदायिकता… कविता (अनवर सुहैल)

सार्थक, समर्थ और सामाजिक भाव-बोध पैदा करती 'अनवर सुहैल' की दो कवितायें .....|  बाज़ार और साम्प्रदायिकता...  बाज़ार रहें आबाद अनवर सुहैल बढ़ता रहे निवेश इसलिए वे नहीं हो सकते दुश्मन भले से वे रहे हों आत... Read More...

समय के झरोखे से हरिशंकर परसाई…: आलेख (’सुधेंदु पटेल)

हरिशंकर परसाई केवल लेखक कभी नहीं रहे. वे लेखक के साथ-साथ एक्टिविस्ट भी थे. उनका समूचा जीवन आन्दोलनों और यूनियनों से जुड़ा रहा. आन्दोलन छात्रों के, श्रमिकों के, शिक्षकों के, लेखकों के भी. वे लेखक के रूप में अपनी... Read More...
(हनीफ मदार)

पुस्तक मेले से लौटकर…: संपादकीय (हनीफ मदार)

पुस्तक मेले से लौटकर...  हनीफ मदार एक दिन कटता है तो लगता है एक साल कट गया | भले ही यह एक किम्बदंती ही सही लेकिन वर्तमान में सच साबित हो रही है | आधुनिकता के साथ समय जिस तेज गति से आगे बढ़ रहा है उस गति से आध... Read More...