हिंदी को जरूरत है एक “क्यों” की: संपादकीय (हनीफ मदार)

हिंदी को जरूरत है एक “क्यों” की  हनीफ मदार फिर से हिंदी दिवस पर मैं असमंजस में हूँ हर साल की तरह, ठीक वैसे ही जैसे हर वर्ष मदर्स डे, फादर्स डे…….लम्बी सी लिस्ट है (कुछ और का आविष्कार और हो गया होगा, उसकी जान... Read More...

भगवान् भरोसे…: व्यंग्य (हनीफ मदार)

किसी भी व्यंग्य रचना की सार्थकता वक्ती तौर पर उसकी प्रासंगिकता में अंतर्निहित होती है | यही कारण है कि हरिशंकर परसाई, शरद जोशी आदि को पढ़ते हुए  हम उसमें अपने वर्तमान के सामाजिक, राजनैतिक अक्स  देखते हैं | हालां... Read More...

पत्रकारिता के अब उद्देश्य बदल गये हैं !: आलेख (डॉ० नमिता सिंह)

आज व्यवसायिकता समाज और राजनीति की आधारशिला है। आज़ादी मिलने के बाद भी प्रमुख अख़बार और पत्रिकाएँ बड़े व्यापारिक संस्थानों से जुड़ी थीं लेकिन उनके लेखक-संपादक-स्तंभकारों को पर्याप्त वैचारिक स्वतंत्रता थी। वे जन-विर... Read More...

हाकिम कथा: कहानी (अखिलेश)

"रजाई के भीतर आते ही उसे पास में पुनीत की अनुभूति होने लगती थी। अचानक वह भय से सिहर गई। हमेशा ऐसा ही होता रजाई उसे मादकता की नदी में डुबोकर खौफ़ की झाड़ी में फेंक देती थी। वर्तमान का अहसास ख़ौफ की झाड़ी ही था उ... Read More...

‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग एक” (शक्ति प्रकाश)

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृ... Read More...

कटी नाक, जुड़ी नाक: कहानी (अमरपाल सिंह ‘आयुष्कर’)

'अमरपाल सिंह' की कहानियों में भाषाई पकड़ और कहानीपन निश्चित ही एक प्रौड़ कथाकार होने का आभास कराता है | प्रस्तुत लघुकहानी में भी अमरपाल सिंह में एक संभावनाशील लेखक के तेवर नज़र आते हैं ......|- संपादक  कटी नाक,... Read More...

भविष्य की मौत: एवं अन्य कविताएँ (दामिनी यादव)

जहाँ वर्तमान जब मौजूदा प्रतीकों के साथ असल रूप में संवेदनाओं के धरातल पर रचनात्मक दस्तक देता है तब कोई कविता महज़ एक रचना या लेखकीय कृति भर नहीं रह जाती बल्कि वह एक स्वस्थ संवाद की ताजगी के साथ उतरती है समाज की ... Read More...

भक्ति आन्दोलन और काव्य: समीक्षा (आशीष जायसवाल)

‘सूर की कविता  का समाज’ और ‘मीरा के काव्य में सामाजिक पहलू’ दो ऐसे महत्वपूर्ण कवियों के विषय में लिखा गया लेख है जो प्रायः हिन्दी साहित्य के आलोचकों के उतने प्रिय विषय नहीं रहें है एवम् इनकी काव्यों में सामाजिक... Read More...

अदृश्य दुभाषिया: एवं अन्य कविताएँ (अभिज्ञात)

अचेतन मानव तंतुओं को चेतन में लाने का प्रयास करतीं 'अभिज्ञात' की कवितायें ...... अदृश्य दुभाषिया  अभिज्ञात चिट्ठियां आती हैं आती रहती हैं कागजी बमों की तरह हताहत करने समूची संभावना के साथ कौन सा शब्... Read More...

स्त्रियों की छद्म आज़ादी का सूरज फेसबुक की झिरियों से: समीक्षा (डॉ० मोहसिन खान)

यूँ तो हिन्दी उपन्यासों की श्रृंखला में हिन्दी में हजारों उपन्यास आए, जो विषयों के प्रतिपादन में नए चौंका देने वाले विषय लेकर उपस्थित हुए। कई उपन्यास अपनी मौलिक शैली के रूप में भी प्रसिद्ध हुए। परंतु मेरी दृष्ट... Read More...