अदृश्य दुभाषिया: एवं अन्य कविताएँ (अभिज्ञात)

अचेतन मानव तंतुओं को चेतन में लाने का प्रयास करतीं 'अभिज्ञात' की कवितायें ...... अदृश्य दुभाषिया  अभिज्ञात चिट्ठियां आती हैं आती रहती हैं कागजी बमों की तरह हताहत करने समूची संभावना के साथ कौन सा शब्... Read More...

स्त्रियों की छद्म आज़ादी का सूरज फेसबुक की झिरियों से: समीक्षा (डॉ० मोहसिन खान)

यूँ तो हिन्दी उपन्यासों की श्रृंखला में हिन्दी में हजारों उपन्यास आए, जो विषयों के प्रतिपादन में नए चौंका देने वाले विषय लेकर उपस्थित हुए। कई उपन्यास अपनी मौलिक शैली के रूप में भी प्रसिद्ध हुए। परंतु मेरी दृष्ट... Read More...

स्त्री आंदोलन-इतिहास और वर्तमान: आलेख ‘छटवीं क़िस्त’ (डॉ0 नमिता सिंह)

'स्त्री देह आज हाई टेक्नोलॉजी के माध्यम से विभिन्न तरीकों से मनोरंजन के साधन के रूप में उपलब्ध हो रही है। स्त्रीदेह का वस्तुकरण पुरानी मान्यताओं, नैतिकता के मानदंडों को ध्वस्त कर हर क्षेत्र में स्थापित हो रहा ह... Read More...

“हमरंग” की टीम से एक खुशनुमा भेंट: (सीमा आरिफ)

हमरंग पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-छांट के, हर चौथे या पांचवें दिन प्रकाशित होंगे | हमारे इस प्रयास को लेकर हो सकता ... Read More...

दुलारी बाई @ एमए इन हिंदी: व्यंग्य (डॉ० कर्मानंद आर्य)

"फारवर्ड ब्लाक आजकल एक दूसरे का कान फोड़ रहे हैं. गरिया रहे हैं अपने पूर्वजों को. सालों और बनो प्रगतिशील और भला करो मनुष्यों का. आदमी को आदमी समझो बहुत बोलते थे अब भुगतो. ‘एमए इन हिंदी’ सांप घुस गया है छाती में.... Read More...

औरतें नहीं देखती आईना: कविताएँ (रुची भल्ला)

स्त्री-विमर्श और कविता में नये मुहावरों से लैस भाषा-शिल्प...रूचि भल्ला बड़ी ज़िम्मेदारी से अपने समय और समाज का सच बयान करती हैं...संपादक औरतें नहीं देखती आईना   रूचि भल्ला औरतें नहीं देखती हैं आईना वो तो श... Read More...

हमारे गाँव की विधवाएँ: एवं अन्य कवितायेँ (अनुपम सिंह)

वर्तमान सामाजिक और राजनैतिक बदलाव के बीच किसी कलैंडर की तरह बदलते और गुजरते वर्षों को युवा पीढ़ी खुद के भीतर बढती हताशा के रूप में देखने को विवश है और यह सायास है कि ऐसे में उसकी आंतरिक चेतना असार्गर्भित नगरीय च... Read More...

सुबह ऐसे आती है: कविता (निर्मल गुप्ता)

सच के धरातल पर आकार लेती मानवीय अभिव्यक्ति की एक कविता........ सुबह ऐसे आती है  पुजारी आते हैं नहा धोकर अपने अपने मंदिरों में जब रात घिरी होती है। वे जल्दी जल्दी कराते हैं अपने इष्ट देवताओं को स्नान इसके... Read More...

मैं भी आती हूं ….! कहानी (हनीफ मदार)

वर्तमान समय की  उपभोगातावादी व्यवस्था के कारण  हरी भरी भूमि और  पेड़ों को काटकर ईट पत्थर की चन्द दीवारों द्वारा बने मकानों के दर्द को बयाँ करती है  हनीफ मदार की कहानी  ' मैं भी आती हूँ ..... ' जिसमें धर्म के आगे... Read More...

जब तक मैं भूख ते मुक्त नाय है जाँगो…. : नाट्य समीक्षा (हनीफ मदार)

13 व् 14 जून को मथुरा में दो दिवसीय नाट्य आयोजन में मंचित हुए 'राजेश कुमार' के नाटक "सुखिया मर गया भूख से" की मंचीय प्रस्तुति पर 'हमरंग' के संपादक "हनीफ मदार" का समीक्षालेख......| - अनीता चौधरी  जब तक मैं भू... Read More...