विचलन भी है जरूरी: ‘हमरंग’ संपादकीय (हनीफ़ मदार)

विचलन भी है जरूरी  हनीफ मदार कल चाय की एक गुमटी पर दो युवाओं से मुलाक़ात हुई दोनों ही किन्ही मल्टीनेशनल कम्पनियों में कार्यरत हैं | इत्तेफाक से दोनों ही कभी मेरे स्टूडेंट रहे हैं | उन्होंने मुझे पहचान लिया औ... Read More...

हाइकू : (अमन सिंह ‘चांदपुरी’)

युवा कलमकार 'अमन चांदपुरी' की कुछ 'हाइकू' रचनाएं हमरंग के माद्ध्य्म से हाइकू मर्मज्ञों के समक्ष ..... आपकी टिप्पणी की अपेक्षा ....| हाइकू अमन सिंह 'चांदपुरी' (1) गूँजी हैं चीखें शब्द-शब्द हैं मौन रोत... Read More...

इस्क्रा: कविता (दीपक निषाद)

"हमरंग" हमेशा ही प्रस्फुटित होते ऐसे रचनाकारों को जगह देते रहने को तत्पर रहा है जो सार्थक लेखन की दिशा में अपनी कलम चलाते दिख रहे हैं | 'दीपक निषाद' उन्हीं उभरते रचनाकारों की कड़ी में अगला नाम है  | वैचारिक रूप ... Read More...

‘आल्हा’ शैली में लिखी गईं कुछ कवितायें: (शिव प्रकाश त्रिपाठी)

विभिन्न भारतीय कला संस्कृतियों में, पूर्वोत्तर भारतीय कला "आल्हा" लोक गायन में अपने छन्द विधान एवं गायन शैली की दृष्टि से विशिष्ट दिखाई पड़ती है । माना जाता रहा है कि इसे सुन कर निर्जीवों की नसों में भी रक्त संच... Read More...

“हमरंग” की टीम से एक खुशनुमा भेंट: (सीमा आरिफ)

हमरंग पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-छांट के, हर चौथे या पांचवें दिन प्रकाशित होंगे | हमारे इस प्रयास को लेकर हो सकता ... Read More...

साहित्यिक वैचारिकी को आगे बढ़ाने का सगल, ‘हमरंग’: (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

हमरंग के दो वर्ष पूरा होने पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-छांट के, हर चौथे या पांचवें दिन प्रकाशित होंगे | हमारे इस प्... Read More...

मेहनतकश के सीने में: कविता (अनवर सुहैल)

आप बीती जो जग में देखी..... कोयला खदान मजदूरों के बहाने दुनिया के मजदूरों की कुंठा, विषमता और बिडम्बना को खुद से गुजारकर शब्द देते कवि, लेखक 'अनवर सुहैल' ........| मेहनतकश के सीने में  कितना कम सो पाते हैं ... Read More...

‘उत्तमी की माँ’ एक विमर्श की माँग: आलेख (साक्षी)

पुरुषसत्तात्मक समाज में लड़की का नैतिकता पूर्ण आचरण व स्वयं को पुरुष के आनंद की वस्तु बनाना स्त्री की नियति है और ऐसा ही उसका मनोविज्ञान भी बनता है। सिमोन द बोउवार कहती है’’ स्त्री बनती नहीं बनाई जाती है’ और ‘‘... Read More...

समकालीन हिन्दी आलोचना और कबीर: आलेख (संजय कुमार पटेल)

कबीर पर आज तक जितने भी आलोचक अपनी आलोचना से दृष्टिपात किए हैं वह आज भी सबको स्वीकार्य नहीं है । सभी लोग अपने-अपने अनुसार कबीर को व्याख्यायित करने का प्रयास किए हैं लेकिन उन्हीं में से कबीर के प्रति कुछ ऐसे भी श... Read More...
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नहीं टूटेगा आपका भरोसा….: संपादकीय (हनीफ मदार)

नहीं टूटेगा आपका भरोसा....  हनीफ मदार किसी भी लेखक की पूँजी उसका रचनाकर्म होता है | अपनी रचनाओं को संजोने के लिए लेखक अपनी जिंदगी के उन क्षणों को अपने लेखन के लिए आहूत करता है जो आम तौर पर अपने निजत्व या अपन... Read More...