जन-गण-मन: एवं अन्य कविताएँ (विद्रोही)

3 जनवरी 1957 को फिरोज़पुर (सुल्तानपुर) उत्तरप्रदेश में जन्मे, रमाशंकर यादव 'विद्रोही' हमारे बीच नहीं रहे ... जैसे जे एन यू खाली हो गया है... जैसे फक्कड़ बादशाहों की दिल्ली खाली हो गयी है !! उनका बेपरवाह अंदाज़, फ... Read More...

निंदक नियरे: एवं अन्य कविताएँ (रूपाली सिन्हा)

लेखन और अध्यापन से जुड़ी "रुपाली सिन्हा" की कविताओं में सहज ही वर्तमान सामाजिक, मानसिक वातावरण जीवंत रूप में उठ खडा होता जान पड़ता है | आपकी रचनात्मकता महज़ विद्रूप देखने की आदी नहीं है बल्कि वह कारणों की पड़ताल कर... Read More...

भविष्य की मौत: एवं अन्य कविताएँ (दामिनी यादव)

जहाँ वर्तमान जब मौजूदा प्रतीकों के साथ असल रूप में संवेदनाओं के धरातल पर रचनात्मक दस्तक देता है तब कोई कविता महज़ एक रचना या लेखकीय कृति भर नहीं रह जाती बल्कि वह एक स्वस्थ संवाद की ताजगी के साथ उतरती है समाज की ... Read More...

‘आया हमीं में से है’: अखिलेश्वर पांडेय की कविताएँ…

अखिेलश्वर पांडेय का एक कविता संग्रह ‘पानी उदास है’ हालिया प्रकाश्य है। भारी-भरकम शब्दावलियों से बाहर फिजाओं में तत्सम और तद्भव के बीच तैर रहे देसी आमफहम शब्दों से लैस इनकी कविता पढऩे पर एकबारगी यह कवितानुमा लगत... Read More...

परले ज़माने का राजा: कविता (सूरज बडात्या)

हिंदी कविता में प्रखर राजनितिक चेतना और वैज्ञानिक सोच के धनी सूरज बडत्या की कवितायें समय-सापेक्ष हैं और हस्तक्षेप करती हैं अपने समय की चुनौतियों से---संपादक परले ज़माने का राजा !  एक  परले ज़माने की बात है .... Read More...

अनीता चौधरी की तीन कविताएँ….

इंसान के दुनिया में आने के साथ ही प्रेम दुनिया में आया और भाषा के बनने के साथ ही प्रेम की रचनात्मक अभिव्यक्ति कविता भी किन्तु साहित्य में कविताई प्रेम अभिव्यक्ति करती रचनाएं इंसानी और सामाजिक सरोकारों से भी विम... Read More...

मंडी हाउस में एक शाम: एवं अन्य कविताएँ (अंकिता पंवार)

कविता प्रेम है, प्रकृति है, सौन्दर्य है और सबसे ऊपर एक माध्यम है खुद के प्रतीक बिम्बों में समाज के धूसर यथार्थ को उकेरने का | जैसे खुद से बतियाते हुए मानस को सुनाना या मानस से बतियाते हुए खुद को सुनाना | कुछ ऐस... Read More...

‘सीमा आरिफ’ की कविताएँ…..

बेजुबान कलम से निकलती, और खोखली होती वैचारिक दीवारों को थपथपाती हमजुबां कविताएँ .........| १-  सीमा आरिफ अपनी सोच-विचारों को अपनी जेब में रखो जिसे तुम बड़े फ़ख्र से मार्क्सवाद,साम्यवादी विचारधारा कहते... Read More...

आत्महत्या: कविता (नित्यानंद गायेन)

(कभी-कभी अचानक कोई कविता मन-मस्तिष्क में यूं पेवस्त होती है कि बहुत देर तक थरथराता रहता है तन-मन...नित्यानद गायेन ने आत्महत्या जैसे विषय पर भावपूर्ण कविता लिखी है...संपादक) आत्महत्या आत्महत्या पर लिखी गयी ... Read More...

हवाले गणितज्ञों के: एवं अन्य कविताएँ (अभिज्ञात)

अभिज्ञात, मानवीय रिश्तों के सूक्ष्म धागे के साथ सामाजिक,  आर्थिक  विषमताओं की समर्थ सार्थक पड़ताल कर रहे हैं अपनी इन दो कविताओं में , हालांकि आपकी कवितायें अन्य कई रंगों और सरोकारों के साथ गुजरती हैं | हमरंग पर ... Read More...