तारीख पे तारीख…., कविता (तरसेम कौर)

देश के किसी भी नागरिक को समय पर न्याय न मिल पाना भी हमारे सरकारी तंत्र और लचर क़ानून व्यवस्था की पोल तो खोलता ही है, साथ में यह भी दर्शाता है कि  सदियों बीत जाती है पर बेबस और लाचार लोगों को इन्साफ नहीं मिल पाता... Read More...

‘जपते रहो’ कविता (अनुपम त्रिपाठी)

युवा छात्र, संस्कृत कर्मियों की बनती यह सामाजिक दृष्टि अपने दौर की एक सुखद छाँव की अनिभूति से भर देती है, कुछ यही एहसास कराती हिन्दू कॉलेज में बी.ए.(आनर्स) सैकंड इयर के छात्र ‘अनुपम त्रिपाठी’ की यह कविता …..| –... Read More...

ओह दाना मांझी तुम भी न, एवं अन्य कवितायें (अशोक कुमार)

कम शब्दों में बड़ी बात कहने का सामर्थ्य रखती है कविता | जैसे मिर्ची का एक बीज जो झनझना सकता है दिमाग तक | शब्दों की घनी बुनावट के बिना भी जिंदगी के गहरे रंगों कुछ इसी अंदाज़ के साथ उकेरतीं 'अशोक कुमार' की कविताये... Read More...

जयति जय जय , जयति भारत: कविता (संध्या नवोदिता)

भारतीय सेना द्वारा इंसानियत के दुश्मनों के खिलाफ अंजाम दिए गए बहादुरी के कारनामे से हम सभी न केबल गद-गद हैं बल्कि ‘जयति भारत’ की गूँज हमारे मन में उठ रही है और हमारे कानों को सुनाई भी दे रही है | और शायद यही सम... Read More...