मरना कोई हार नहीं होती: संस्मरण (हरिशंकर परसाई) -: परसाई द्वारा मुक्तिबोध पर लिखा गया संस्मरण :-

अली मंजिल: कहानी (अवधेश प्रीत)

‘अली मंजिल’ अवधेश प्रीत की हमरंग पर प्रकाशित होने वाली दूसरी और बहु चर्चित कहानी है|  कहानी अली मंजिल बिना किसी शोर के बिना किसी प्रत्यक्ष मानवीय त्रासद घटना के एक दम मौन रूप में भी न केवल मानवीय संवेदनाओ... Read More...
तीन मुलाकातें: कहानी (डा0 नमिता सिंह)

तीन मुलाकातें: कहानी (डा0 नमिता सिंह)

     डा0 नमिता सिंह तीन मुलाकातें मेरी और मिताली की पहली मुलाकात देहरादून में हुई थी। वहाँ के गवर्नमेंट गर्ल्स कालेज में दो दिन की सेमिनार थी। कथा साहित्य पर कोई विषय था। ‘विचार और सर्जनात्मकत... Read More...
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कामवाली की जाति: लघुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

सुशील कुमार भारद्वाज कामवाली की जाति गूगल से साभार सारिका बहुत परेशान थीं |घर के सारे काम खुद ही करने पड़ते थे | अंत में उसने पडोसी के घर काम करने वाली रागिनी से मदद मांगने की सोचीं ... Read More...
‘कबीर का मोहल्ला’ वाणी पकाशन पर उपलब्ध

कबीर का मोहल्ला: कहानी (मज़कूर आलम)

‘कबीर का मोहल्ला’ मजकूर आलम के कथा संग्रह की शीर्षक कहानी है | उनकी चिर-परचित शैली में उपस्थित यह कहानी समाज में गहरे धंसे विकृत मानवीय पूर्वाग्रहों को आईना दिखाते हुए तमाम पारम्परिक व् आधुनिक व्यवस्थापकी... Read More...

एक मामूली आदमी का इंटरव्यू

    एक मामूली आदमी का इंटरव्यू  अवधेश प्रीत वह एक मामूली आदमी थे। उतने ही मामूली, जितना कि कोई दो-चार बार भी देखे तो, उसमें ऐसा कुछ नजर नहीं आये, जिसके जरिए उसे याद रखा जा सके। रहन-सहन ही ... Read More...
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चरित्रहीन : कहानी

आज भी जिस समाज में पुरषों का इधर उधर मुहँ मारना उनकी पुरुषीय काबलियत माना जाता है और औरत के इंसान होने के हक़ की बात करना भी उसके चरित्रहीन होने का प्रमाण घोषित हो जाता हो उस समाज में औरत की अस्मिता से जुड़... Read More...

…और फिर परिवार : कहानी (मज़कूर आलम)

मज़्कूर आलम की कहानी ‘और फिर परिवार’ एक बेहद मजबूर, बेबस और लाचार लड़की की त्रासदी लगी, जो खुद को विकल्पहीन महसूस कर आत्महत्या कर लेती है, लेकिन पुनर्पाठ में लगा कि कई बार स्थितियां आपसे बलिदान मांगती हैं... Read More...
अम्मी…: कहानी (अवधेश प्रीत)

अम्मी…: कहानी (अवधेश प्रीत)

“माँ” यकीनन “माँ” होती है हिन्दू या मुसलमान नहीं | यह बिडम्बना ही है कि वर्तमान अवसरवादी राजनीति और उसके प्रभाव से प्रभावित समाज द्वारा गढ़ी गई अवधारणाओं ने इंसान को इंसान के प्रति इतना शंकालू बना दिया है ... Read More...

जिन दिनों…: कहानी (संजीव चंदन)

दुनिया की प्रगतिशील चेतना के अग्रणी संवाहक वर्ग को केंद्र में रखकर बुनी गई ‘संजीव चंदन’ की यह कहानी आधुनिक समय और समाज का एक नया विमर्श रचती है | प्रस्तुति का अनूठापन कहानी विस्तार पर भारी है जो  इस कहानी... Read More...
बुझव्वल: कहानी (अमृता ठाकुर)

अपने-अपने सच: कहानी (अमृता ठाकुर)

भावनात्मक संवेदनाओं से खेलना, गिरबी रखना या किसी भी कीमत पर खरीदना किसी वस्तु या खिलौने की तरह और तब तक खेलना जब तक खुद का जी चाहे फिर चाहे किसी लेस्बियन स्त्री की दमित इच्छाएं हों या किसी कामुक पुरुष की ... Read More...