चरित्रहीन : कहानी (हनीफ मदार )

अनुप्राणित : कहानी (हनीफ मदार)

प्रेम एक खूबसूरत इंसानीय व मानवीय जीवन्तता का एहसास है  जो किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय से बढ़कर होता है जिस पर किसी भी तरह की बंदिशे नहीं लगाई जा सकती क्योंकि  बिना प्रेम के मानव जीवन संभव नहीं होता | प्... Read More...

परवाज़: कहानी (अनीता चौधरी)

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीब्र से तीब्रतम होते संचार औ... Read More...

क़बरखुद्दा : कहानी (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा’)

शहर मे अभी भी रियसती शहर होने के अवशेष मौजूद हैं, शहरपनाह की मोटी-मोटी दीवारें, कई दरवाज़े, अस्तबल, मक़बरे, छोटी हवेलियाँ, छोटी गढ़ियाँ, इमारतें, मोहल्लों के नाम इत्यादि से अब भी पता चलता है कि यह एक रियासत ... Read More...

शोकपर्व: कहानी (अनवर सुहैल)

आशा -निराशा, कुंठा-अवसाद के बीच जीते-जी अपना शोकपर्व मनाती युवा पीढी के मानसिक एवं आंतरिक अंतर्द्वंद का बेहद रोचक और पठनीय शैली में विश्लेष्ण करती ‘अनवर सुहैल’ की कहानी, जो सहज अंदाज़ में कथित आशाओं से भरे वर्तम... Read More...
शाकिर उर्फ़…… : कहानी (अनवर सुहैल)

शाकिर उर्फ़…… : कहानी (अनवर सुहैल)

‘राजू ने कहा – ”हम खुद अपने गांव में हर साल दुर्गा-पूजा में खुबसूरत ढंग से पंडाल सजाते हैं साब, भले से दाढ़ी-टोपी वाले गुस्सा करते हैं लेकिन कितना अच्छा लगता है कि लोग कितनी श्रद्धा से पूजा करते हैं और ... Read More...

लाईट हाउस सिनेमा: कहानी (शेखर मल्लिक)

पूंजीवादी सिद्धांतों के आधार पर विकास या सामाजिक बदलाव की प्रिक्रिया में हमेशा ही एक बड़े वर्ग की मूल आवश्यकताओं उसके सपने, आकांक्षा, बल्कि उसका सम्पूर्ण जीवन ही हाशिये का शिकार हुआ है | तकनीकी दृष्टि से सामाजिक... Read More...

मुहब्बत ही दीन-औ-ईमां मेरा: कहानी (शेखर मल्लिक)

“वसंत और तबस्सुम की अंतरजातीय शादी, इस औद्योगिक शहर के एक छोटे से हिस्से में, जहाँ ये लोग बसर कर रहे थे, एक किस्म के लोगों को पसंद नहीं आई थी… बल्कि नागवार दुस्सहासिकता लगी थी. मेरा पत्रकार मित्र विजय ब... Read More...

टुअर होते वक्त में: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाहा)

समाज, स्थितियों, परिस्थितियों या राजनीति में समय के साथ क्या वाकई कुछ बदलाव हुआ …… या महज़ नाम और स्वरूप ही बदले यह तो देखना और सोचना हमें खुद को…….. | ‘कभी’ सामंती व्यवस्था ‘थी’ और आज……कॉर्पोरेट या कॉ... Read More...