‘पद यात्रा,‘पद’ और ‘अंतिम यात्रा: व्यंग्य (देवेन्द्र सिंह सिसौदिया)

व्यंग्यकार की दृष्टि खुद से लेकर अपने आस-पास, सामाजिक और राजनैतिक क्रिया कलापों और घटनाओं,  जो आम तौर पर सामान्य घटनाओं की तरह ही दिखाती हैं, उनमें से भी बेहतर सामाजिक सरोकारों के लिए सार्थक तर्क खोज ही लेतीं ह... Read More...

पिंजर पर टंगी त्वचा एवं अन्य कविता (पुलकित फिलिप)

23 वर्षीय भगत सिंह आज तक युवाओं के प्रेरणा श्रोत हैं ..... यह अलग बात है कि कम ही युवा पीढ़ी भगत सिंह को महज़ एक व्यक्ति के रूप में ही नहीं उन्हें उनके सम्पूर्ण विचार के साथ जानती पहचानती है, और यह बात कहने से नह... Read More...

ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर: व्यंग्य (आरिफा एविस)

नेताजी: "बिना समर्थन के आपको जल, जंगल और जमीन का पुश्तैनी हक़ कैसे मिल सकता है? जब सीधी ऊँगली से घी नहीं निकलता तो ऊँगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है फिर तुम्हें तो घी से मतलब है.आम खाओ गुठलियों को मत गिनों. सरकार आये य... Read More...

गुस्से की गूँज: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

यद्यपि गुस्से को पी जाने का सटीक फार्मूला हमारे संत महात्मा बहुत पहले से बता गए हैं लेकिन अब ऐसा सम्भव नही रह गया है, क्योंकि पीने के लिए अब बहुत सी चीजें उपलब्ध हैं।  गुस्सा पीना पिछडा हुआ और अप्रासंगिक तरीका ... Read More...

बोलो अच्छे दिन आ गये: व्यंग्य (आरिफा एविस)

पुलिस विभाग देशद्रोही, आतंकवादियों, आदिवासियों, किसानों और छात्रों को नियन्त्रित करने में लगी है | क्या यह हमारी सफलता नहीं है? क्या ये सब अच्छे दिनों की सुगबुगाहट नहीं है? गंगा की सफाई, देशद्रोहियों की सफाई अभ... Read More...

मोटेमाल की महिमा: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

दिनों बहुत उत्साह से लोगों से ‘हाथ धुलवाने’ के प्रयास हो रहे हैं, जब तब किन्ही हाथों से गुलाबी रंग जरूर झरने लगता है मगर यह विकास का समय है. कोयला भी केवल कोयला नहीं रहा, कोयला बहुरूपिया हो गया है. वह हीरा हो स... Read More...

महात्मा गाँधी को चिट्ठी पहुँचे: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है …….” के दसवें दिन ……. परसाई की व्यंग्य रचना ‘महात्मा गाँधी को चिट्ठी पहुँचे’) महात्मा गाँधी को चिट्ठी पहुँचे  यह चिट्ठी महात्मा मोहनदास करमचंद गाँधी को पहुंचे. महात्माजी, मैं ... Read More...

बिना जूते ओलम्पिक पदक: व्यंग्य (एम० एम० चंद्रा)

"पूरी दुनिया में जूते फेंकने की परम्परा थोड़ी-सी नयी जरूर है, लेकिन समय, देश-काल के अनुसार यह अपने में परिवर्तन जरूर कर रही है . आज पूरी दुनिया में इसका प्रचलन बड़े पैमाने पर शुरू हो गया है. जिसका प्रारम्भ अमेरिक... Read More...
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बदचलन, व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है …….” के अंतिम और परसाई के जन्म दिवस पर ……. उनकी की व्यंग्य रचना ‘बदचलन’) डिप्टी साहब को मालूम था कि मेरे बारे में खबर इधर पहुँच चुकी है। वे यह भी जानते थे कि यहाँ सब लोग मुझसे ... Read More...

हिन्दी और मेरा आलाप: व्यंग्य (ब्रजेश कानूनगो)

सब जानते हैं कि हिन्दी रोजगार की कोई गारंटी नही देती, अन्य कोई भाषा भी नही देती लेकिन यह भी सत्य है कि  अंग्रेजी के ज्ञान के बगैर नौकरी नही मिलती। मीटिंगों-पार्टियों में हिन्दी में बातचीत नही होती। मॉल और होटलो... Read More...